फुटबॉल नहीं तो कुश्ती सही, लेकिन चोट से हार नहीं मानूंगी
Toronto , Ontario ,  Canada , North America   | अपडेटेड: Wednesday, Sep 10, 2014 at 09:56 am EST

मुकेश तिवारी - जब घुटने की चोट ने उसे फुटबॉल से दूर कर दिया तो उसकी जगह कोई और होता तो शायद उसने खेलने से तौबा कर ली होती लेकिन गुरलीन टाक उन लोगों से में से नहीं बनी। उसने कभी हार न मानने की ठानी और अब वो फुटबॉल की जगह कुश्ती लड़ती है।
पहले गुरलीन का सपना था कि वो फुटबॉल के जरिये ओलंपिक्स का हिस्सा बने। इसके लिए उसने कड़ी मेहनत की थी लेकिन बाएं घुटने में उठी तकलीफ उसे आगे नहीं बढ़ने दे रही थी। कक्षा पांचवीं से चले आ रहे मामूली दर्द ने अब बेहद गंभीर रूप ले लिया था। दौड़ते समय पूरा पाँव एक तरफ चला जाता था तो घुटना दूसरी तरफ। वह अन्य खिलाडियों से पिछड़ती चली जा रही थी।
कई डॉकटरों को दिखाने के बाद यह बात सामने आई कि उसके घुटने की हालत एक बेहद दुर्लभ अवस्था थी और इससे निजात पाने के लिए सर्जरी की जरूरत थी लेकिन इसकी सफलता की कोई गारंटी नहीं थी। मार्च 2012 में 16 साल की अवस्था में टोरंटो के सनिबृक हॉस्पिटल में उसके घुटनों की सर्जरी की गई। गुरलीन ने बताया कि हॉस्पिटल में पड़े-पड़े उसके दिमाग में तरह के डरावने विचार आते थे। जैसे क्या होगा यदि वो चल नहीं पाई या इससे भी बुरा यदि उसका पैर ही नहीं रहे। लेकिन इन सबसे उबरते हुए उसने रिकवरी पर ध्यान दिया। उसे पहले नौ हफ़्तों तक बैसाखी पर बिताने पड़े रिकवरी का लंबा मेहनती दौर चल पड़ा।
उसके अपने शब्दों में "मैं अपने घुटने में कुछ भी महसूस नहीं कर पा रही थी। मुझे फिर से चलना सीखना था। मैं फिर से एक बच्चे की तरह महसूस कर रही थी।" लेकिन सबसे बुरी खबर तो अभी उसका इंतज़ार कर रही थी। वो उस समय टूट गई थी जब उसे बताया गया कि वो अपना मनपसंद खेल फुटबॉल अब कभी नहीं खेल सकती। वह इतनी दुखी और परेशान थी कि घर जाकर उसने फुटबॉल से मिले उसके सारे पदक और ट्राफियां फर्श पर फेंक दी।
अपने प्रिय खेल के बाहर होने के बाद उसने कुश्ती की ओर ध्यान दिया जिसे उसने सर्जरी शुरू होने के एक महीने पहले मजे-मजे में खेलना शुरू किया था और उसे मजा भी बहुत आया था। उसने जनवरी २०१३ में कुश्ती फिर शुरू की और ब्रॉक यूनिवर्सिटी की तरफ से ओंटेरियो प्रोविंशियल्स में हिस्सा लिया। अब वह स्वीकार करती है कि उस समय वह प्रतियोगिता के लिए तैयार नहीं थी। लगातार तीन मैचों में उसे हार का सामना करना पड़ा था और हार बार उसे इतना तीव्र दर्द हुआ कि वो रो पड़ी थी। लेकिन उसने कभी हार न मानने की कसम खाई थी। टूर्नामेंट में चौथे गेम में वो फिर उतरी और विजयी हुई।
गुरलीन का कहना है कि उस टूर्नामेंट में मिले अनुभवों ने उसे अधिक दृढ़ निश्चयी बना दिया था और उसने जोर-शोर से कठिन परिक्षण शुरू कर दिया। लुइस आर्बर सेकंडरी स्कूल से पास आउट हुई गुरलीन ने अपनी कुश्ती के लिए अपने कोच ग्रेग कपूसीटी को श्रेय दिया। उसके शब्दों में "कोच ने न सिर्फ मेरा हौसला बढ़ाया बल्कि मुझ पर विश्वास भी जताया और कहा कि मेरे भीतर संभावना है।" गुरलीन ने स्कूल के बाद भी अपने कोच के पास अलग से प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। और इसका असर उसे इस फरवरी में देखने को मिला जब वो फिर से लॉरेंटियन में हुए प्रोविंशियल्स में हिस्सा लिया। यहाँ उसने तीन मैच जीतकर कांस्य पदक जीता। अब उसका हौसला बढ़ गया है और अब वो इस क्षेत्र में और अधिक उपलब्धियां हासिल करना चाहती है।
कुश्ती ने हालाँकि उसे काफी कुछ दिया है लेकिन उसकी नज़र में फुटबॉल की कोई तुलना नहीं है। उसने कहा "मैन फुटबॉल खेलने के लिए यह सब कुछ दे सकती हूँ । " अब वो फुटबॉल में तो ओलम्पिक्स नहीं खेल सकती लेकिन वो चाहती है कि कुश्ती के जरिये उसका यह सपना पूरा हो। "आपको अपने लिए हमेशा ऊँचे लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। मैं लोगों की मदद करने के लिए लोगों को प्रेरित करना चाहती हूँ।"



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