कबतक जलाई जाती रहेंगी महिलाएं!
आशा त्रिपाठी  | अपडेटेड: Sunday, Mar 2, 2014 at 06:30 am EST

असम में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को किस करने वाली महिला की उसके पति ने जलाकर हत्या करने की खबर 01 मार्च को बहुत तेजी से फैली। बाद में जांचोपरांत यह पता चला कि जिस बोनती नामक महिला की जलाकर हत्या की गई है, वह राहुल के कार्यक्रम में नहीं थी। इस संबंध में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई समेत तमाम आला अधिकारी को यह स्पष्टीकरण देना पड़ा है राहुल गांधी को चुमने वाली महिला की जलाकर हत्या हुई है। अब सवाल ये नहीं है कि जिस महिला की हत्या हुई है उसने राहुल गांधी को चूमा या नहीं। सवाल यह है कि महिला जलाकर क्यों मारी गई? चाहे वह मामला कुछ भी हो, पर महिला के उत्पीड़न की बात सामने आई है। इस घटना ने समाज के उस चेहरे को सामने ला दिया है, जिसके बारे में सरकार और जिम्मेदार लोग यह कहते नहीं थकते कि महिलाएं पहले से ज्यादा स्वतंत्र हुई हैं और इनके उत्पीड़न की घटनाएं थमी हैं। यूं कहें कि आज महिलावाद या महिला विमर्श एक फैशन बन गया है। महिलाओं के मुद्दों पर कथित रूप से चिन्तित समाज आंदोलन की राह चल निकला है। ये भी कह सकते हैं कि महिलाओं के लिए हो रहे आन्दोलन कोई नई बात नहीं हैं। नारी अस्मिता और उससे जुड़े तमाम सवालों का हल हमारा समाज बीते दो सौ वर्षों से खोज रहा है तथापि समस्याएं यथावत हैं। अठारहवीं शताब्दी के मध्य से ही दुनिया भर की तमाम महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं। 21 वीं सदी के चौदहवें वर्ष में असम की बोनती की जलाकर की गई हत्या उस हकीकत को बयां कर रहा है, जिस सवाल पर भारतीय लोकतंत्र के पुरोधा अपने ही हाथों से अपनी पीठ थपथपाने में पीछे नहीं रहते।
पिछले दिनों कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी असम के दौरे पर थे। उस दौरान उनसे मिलने व उनकी एक झलक पाने के लिए कांग्रेस के नीचे से लेकर ऊपर तक के कार्यकर्ता-पदाधिकारी कोई कोशिश में थे। उनसे जिनकी मुलाकात हो गई, वो खुद को इसलिए सौभाग्यशाली मान रहे था कि वे अपनी पार्टी के आला नेता के करीब पहुंच गए। तमाम महिलाओं से घिरे राहुल गांधी खुद भी उस वक्त असहज हो गए थे, जब वहां मौजूद कुछ महिलाओं ने प्यार से धड़ाधड़ उनके गाल और माथे को चुमना शुरू कर दिया। 01 मार्च को अफवाह फैली कि राहुल गांधी को भीड़ में चुमने वाली महिला बोनती को उसके पति ने इसलिए हत्या कर दी कि उसने राहुल गांधी को किस किया था। बाद में आधिकारिक रूप से यह बयान दिया गया कि जलाकर मारी गई महिला वह नहीं है, जिसने राहुल गांधी को चुमा था। खैर, अच्छी बात है कि राहुल गांधी को चुमने वाली महिला की हत्या नहीं हुई। लेकिन यह भी कम दुखद नहीं है कि इस बदलते जमाने में आज भी देश का पुरुष प्रधान समाज महिलाओं के बारे में अच्छी धारणा नहीं रखता। लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राहुल गांधी देश भर में अपनी पार्टी के लिए प्रचार कर रहे हैं। 26 फरवरी को जब वह असम के जोरहट में महिला कार्यकर्ताओं से बात कर रहे थे, तब कुछ महिलाओं ने उन्हें माथे और गाल पर किस कर लिया था। फ्रांस की महिला आंदोलनकारी सिमोन द बोउवा ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘द सेकेण्ड सेक्स’ में स्पष्ट लिखा है कि स्त्री का जन्म भी पुरुष की तरह ही होता है मगर परिवार व समाज द्वारा उसमें स्त्रियोचित गुण भर दिए जाते हैं। 1970 में फ्रांस के नारी मुक्ति आंदोलन में भाग लेने वाली सिमोन स्त्री के लिए पुरुष के समान स्वतंत्रता की पक्षधर थीं। महिलाएं चाहे जिस भी नस्ल, वर्ण, जाति, धर्म, संस्कृति या देश की हों, उनका संघर्ष लगभग एक समान है । यह आश्चर्यजनक है कि स्त्रीवादियों के आन्दोलन की जो लहर अठारहवीं शताब्दी में उठी थी,  उसे अबतक मंजिल नहीं मिली है।
यह सुखद है कि साहित्य  और लेखन के क्षेत्र में महिलाओं की दखल बढ़ रही है। इसे भी पुरुष प्रधान समाज पचा नहीं पा रहा है। अक्सर लोग यह कहते हुए पाए जाते हैं कि चूंकि मध्यमवर्ग की स्त्रियां पुरुषों की तुलना में कम काम करती हैं इसलिए उनके पास पढ़ने/लिखने के ज्याहदा अवसर होते हैं। इसीलिए वे मुद्रित साहित्य् और विशेषकर ऑनलाइन की दुनिया में जोरदार ढंग से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इस तर्क के बचकानेपन को भुला कर यदि आगे बढ़ने का उपक्रम किया भी जाए, तो भी यह सवाल दिमाग के किसी खांचे में अटका रहता है कि आखिर क्याआ कारण हैं जो महिला रचनाकार इतनी सक्रिय हो गई हैं। इसका जवाब पाने के लिए करीब सात वर्ष पूर्व के उन हालातों पर नजर डालना होगा, जब हिन्दीय ब्लॉिग के बारे में लोग ज्याटदा नहीं जानते थे। उस दौरान ब्लॉकगिंग की जानकारी को लोगों तक पहुंचाने के लिए कुछ इंटरनेट प्रेमियों ने मिलकर एक विकी बनाया था, जिसमें ‘मेकिंग ए हिन्दी ब्लॉग’ श्रृंखला के अन्तमर्गत ब्लॉगग बनाने के बारे में चरणबद्ध तरीके से बताया गया था। साथ ही साथ वहां एक नारा भी दिया गया था- ‘विचारों को प्रवाहित होने से रोकिये मत। उन्हें दूसरों के साथ बांटिये और दिखा दीजिये दुनिया को कि आप के अन्दर भी एक प्रतिभावान लेखक मौजूद है और आप भी अपने विचारों को प्रभावशाली तरीके से रख सकती हैं।’ जाहिर है, अभिव्यकक्ति के इस अंदाज ने महिला ब्लॉलगर्स को सर्वाधिक आकर्षित किया। यह एक तरह से अभिव्यअक्ति के विस्फोरट की तरह है, जिसकी सफलता देखकर शेष दुनिया के लोग आश्चसर्यचकित नजर आती है।
सबके बावजूद समाज के मौजूदा हालात को देखकर यही कहा जा सकता है कि महिलाओं के उत्थान के लिए समाज और सरकारों द्वारा जो कुछ भी किया जा रहा है वह कुछ थोथी बकवास जैसी प्रतीत होती है। महिलाओं के लिए काम करने वाले लोग काम में कम नाम में ज्यादा विश्वास रखते हैं, यही दिख रहा है। नारी समाज से जुड़ी कई बड़ी घटनाओं से लोगों की भावनाओं को जोड़ने के लिए पिछले दिनों दिल्ली के मोती महल लॉन में लगे पुस्तक मेले की थीम 'नारी सशक्तिकरण' रखी गई। हालांकि, जब स्टॉल्स तलाशे गए तो इस मुद्दे पर अधिकांश प्रकाशकों की झोली खाली मिली। कई प्रकाशकों ने इस साल इस मुद्दे पर कोई किताब छापी ही नहीं। वहीं दूसरी तरफ कुछ प्रकाशकों के पास इस मुद्दे पर जो पुरानी किताबें हैं, उन्हीं के रीप्रिंट एडीशन को ही नया बताया जा रहा है। इस मुद्दे पर नई किताबों की कमी की वजह से पुस्तक मेले की थीम को लोगों ने नकार दिया। पाठकों से लेकर कई वरिष्ठ साहित्यकारों तक ने इस थीम पर पुस्तक मेला लगाने को को बेतुका करार दिया। कहा तो यहां तक गया कि अगर इस मुद्दे को थीम बनाया जाना था, तो इसके पहले पूरी तैयारी होनी चाहिए थी। मेले में सबसे आगे लगे प्रभात प्रकाशन ने भी इस साल केवल दो ही किताबें इस मुद्दे पर प्रकाशित की हैं। किरण बेदी की 'जाग उठी नारी शक्ति' और 'जीत लो हर शिखर' के अलावा स्टॉल पर नारी मुद्दों की नई किताबों का अभाव है। सामयिक प्रकाशन ने स्त्री विमर्श को अपने स्टॉल में अलग से प्रदर्शित किया है। एक प्रकाशन प्रतिनिधि के मुताबिक मृणाल पांडे की 2012 में प्रकाशित 'स्त्री: लंबा सफर' थीम पर सबसे नई किताब है। यह बताने का तात्पर्य था कि महिलाओं के नाम पर आंदोलन, उन्हें जागरूक करने और उनके सर्वांगीण उत्थान की बात करने वाले लोग केवल हवा में तीर चलाते हैं। यही वजह है कि हकीकत प्रतिकूल है।
महात्मा गांधी ने एक बार कहा था हमारे समाज में स्त्रियों को गुलामों की तरह जीना पड़ता है और उन्हें यह भी पता नहीं चलता कि वे गुलामों का जीवन जी रही है। इस स्थिति से उन्हें मुक्ति मिलनी चाहिए। स्त्रियां स्वयं भी ऐसा ही महसूस करती हैं उनसे पूछा गया तो अलग-अलग जो उन्होंने कहा उसका सार यह था ‘हमारे पास जुबान तो है पर हम अपनी बात कह नहीं सकती। हमारे पास पैर तो है पर हम अपनी राह चल नहीं सकती। हमारे पास दिमाग तो है पर हम अपनी दिशा में सोच नहीं सकती। हमारा सब कुछ दूसरों की धरोहर है।‘ नारी को पूज्य बताने वाले संस्कारों से पोषित देश भारत में नारी सिर्फ हिंसा सहने की पर्याय बन गर्इ है। समय और संस्कार बदलने के साथ लोगों की सोच न बदल पाने के कारण महिलाओं के हक में बने कानून भी राहत का सबब नहीं बन पा रहे।  कानून में बदलाव और नए कानून की जरुरत भी पूरी करने की सरकारी कवायद नाकाफी साबित हो रही है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के उपाय सुझाने के लिए हाल ही में गठित एक उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट इस बात की ताकीद भी करती है।
Asha Tripathi
P-2, Flat No. 145
Deepganga Apartment
SIDCUL, Roshnabad
Haridwar (Uttarakhand)



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