इस ‘राष्ट्रीय समस्या’ का निदान आखिर कब तक?
आशा त्रिपाठी  | अपडेटेड: Tuesday, Dec 10, 2013 at 07:55 am EST

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख नवी पिल्लै का कहना है कि बलात्कार भारत की ‘राष्ट्रीय समस्या’ बन चुका है। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस समस्या का निदान कब तक होगा। पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली को एक चलती बस में एक युवती के साथ अमानुषिक हिंसा के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद हुई उसकी मृत्यु ने राजधानी दिल्ली ही नहीं, पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था। युवा छात्र-छात्राओं के साथ-साथ आम नागरिक भी दिल्ली की सड़कों पर कई दिनों तक प्रदर्शन करते रहे। नतीजा यह हुआ कि बलात्कार-संबंधी कानून को और सख्त बनाया गया। मीडिया ने भी इस काम में आगे बढ़कर हाथ बंटाया और लोगों को उम्मीद बंधी कि शायद अब ऐसे जघन्य अपराधों के खिलाफ जनचेतना पैदा होगी और इनमें कमी आएगी। यह उम्मीद पूरी नहीं हुई। दुर्भाग्यवश यौन उत्पीड़न के खिलाफ जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ उसकी घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली से सटे गुड़गांव में पिछले दो दिसंबर को 24 घंटों के भीतर तीन बलात्कार होने की एक सूचना मिली। इनमें दो मामलों में बलात्कार की शिकार नाबालिग लड़कियां थीं। अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित समझी जाने वाली मुम्बई में पिछले आठ माह में बलात्कार की 237 घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें से आठ घटनाएं सामूहिक बलात्कार की थीं। जहां तक पूरे देश का सवाल है, भारत में हर 22 मिनट में एक बलात्कार होता है।

जानकार मानते हैं कि अक्सर गांवों और कस्बों में होने वाले यौन उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाओं की तो कहीं रिपोर्ट तक नहीं होती। इस तरह वे आधिकारिक आंकड़ों से बाहर ही रहती हैं। अधिकांश मामलों में पीड़िता शर्म और संकोच के कारण कुछ बोल ही नहीं पाती और उसे रोकने के पीछे समाज का दबाव भी काम करता है। ऐसे मामलों में अक्सर दोष उसी के सर मढ़ दिया जाता है। जिन मामलों में पीड़ित लड़की हिम्मत दिखाती भी है, उनमें भी उसे न्याय मिलने की राह कांटों से भारी होती है। पिछले कुछ दिनों के भीतर दो ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जिन्होंने इस समस्या से सरोकार रखने वालों की नींद तो उड़ा ही दी है, साथ ही यह भी उजागर कर दिया है कि समाज के प्रभावशाली वर्ग के सदस्यों के दुष्कर्मों का पर्दाफाश करना कितना मुश्किल है। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जूडीशियल साइंसेज, कोलकाता की एक स्नातक ने पिछले माह कानून की एक प्रतिष्ठित पत्रिका के एक ब्लॉग लिखा जिसमें उसने यह बताया कि पिछले वर्ष दिसंबर में जब दिल्ली समेत देश भर में बलात्कार के खिलाफ धरने-प्रदर्शन हो रहे थे, उसी समय उसके दादा की उम्र के सर्वोच्च न्यायालय के एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश ने एक पांच-सितारा होटल के कमरे में उसे यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया था। वह उन दिनों किसी मामले की जांच कर रहे थे और ट्रेनी के रूप में वह युवती उनकी सहायता कर रही थी।

ब्लॉग के छपने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस आरोप की जांच करने के लिए तीन न्यायाधीशों की एक समिति गठित की। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। हालांकि मीडिया के एक पक्ष का कहना है कि युवती के आरोप निराधार नहीं पाये गए हैं। विवाद के केंद्र में न्यायमूर्ति एके गांगुली हैं जो पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष हैं। वह अपने को निर्दोष बताते हैं लेकिन उनके इस्तीफे की मांग लगातार उठ रही है। एक दूसरी घटना ने पूरे देश और मीडिया की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। तहलका के प्रधान संपादक और प्रसिद्ध लेखक तरुण तेजपाल पर आरोप है कि उन्होंने अपनी एक युवा सहयोगी के साथ गोवा में यौन दुर्व्यवहार किया । नए कानून के अनुसार इस तरह का दुर्व्यवहार बलात्कार की श्रेणी में ही आता है। यह महिला पत्रकार तरुण तेजपाल के मित्र की पुत्री ही नहीं, उनकी अपनी पुत्री की निकट मित्र भी है। घटना के कुछ दिन बाद उसने तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी को, जो स्वयं यौन उत्पीड़न के खिलाफ लिख और बोल चुकी हैं, इस बारे में ईमेल लिखा। लेकिन इसके बाद के घटनाक्रम से स्पष्ट हो गया कि न केवल तरुण तेजपाल ने बल्कि शोमा चौधरी ने भी इस अपराध पर काफी हद तक पर्दा डालने की कोशिश की।  इस समय तेजपाल गोवा पुलिस के हिरासत में हैं। लाखों भक्तों द्वारा पूजे जाने वाले संत आसाराम बापू भी बलात्कार के आरोप में जेल में हैं और उनके पुत्र नारायण साई भी लगभग दो माह फरार रहने के बाद पुलिस की गिरफ्त में आ गए हैं।

दरअसल, यौन उत्पीड़न का संबंध सत्ता और अधिकार से है और बलात्कार इसका चरम रूप है। यौन उत्पीड़न की घटनाएं शक्ति प्रदर्शन के प्रयास से पैदा होती हैं और इनमें दूसरे पक्ष की इच्छा या सहमति को कोई महत्व नहीं दिया जाता। अक्सर इनमें एक पक्ष ताकतवर और दूसरा कमजोर होता है। यह शक्ति शारीरिक भी हो सकती है और आर्थिक एवं सामाजिक भी। यह दूसरे के अस्तित्व को नकारने और उसे कुचलने का भी प्रयास है। इसलिए आपसी रंजिश का बदला लेने और जातीय एवं सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में भी बलात्कार का सहारा लिया जाता है। जो लोग यह मानते हैं कि महिलाएं पश्चिमी वस्त्र पहन कर पुरुषों को आकर्षित करती हैं और एक अर्थ में स्वयं ही यौन उत्पीड़न को आमंत्रित करती हैं, उन्हें इस सच्चाई को देखना चाहिए कि भारत में बलात्कार की शिकार होने वाली अधिकांश महिलाएं पारंपरिक वस्त्र ही पहनती हैं और यौन उत्पीड़न का संबंध सत्ता विमर्श से है, वस्त्रों से नहीं। इसलिए तरुण तेजपाल, आसाराम बापू और न्यायमूर्ति गांगुली के मामले अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनसे पता चलेगा कि भारतीय न्यायव्यवस्था प्रभावशाली लोगों को सजा देने में सक्षम है या नहीं।

तरुण तेजपाल तो अपने ही एक नॉवल ‘मेरे कातिलों की कहानी’ के एक किरदार जैसे दिखते हैं। उन पर लगे यौन दुराचार के आरोप ने सत्ता और ताकत, फिर चाहे वो मीडिया, पत्रकार और प्रतिष्ठा की ही क्यों न हो, उसे बेनकाब कर दिया है। अपने पत्रकारीय और प्रबंधकीय तेज से देश-विदेश में अपार ख्याति, प्रताप और ऐश्वर्य बटोर चुके तरुण तेजपाल के इर्दगिर्द अब स्तब्धता, अपमान, शर्म, सजा और फजीहत का एक बड़ा घेरा खिंच गया है। तेजपाल कुख्यात यौन हमलावर, दुर्दांत भ्रष्टाचारी और निकृष्ट पेशेवर की तरह पेश किए जा रहे हैं। अचानक खबरों की और मुद्दों की सारी सुईयां तेजी से घूमती हुई तेजपाल पर अटक गई हैं। तेजपाल की कथित यौन जघन्यता की मीडिया कवरेज भी कम भयानक नहीं, ये देखकर भय ही लगता है। इस बहाने हम कॉरपोरेट पूंजीवादी मीडिया के कई विद्रूपों को भी पढ़ सकते हैं। मीडिया संस्थानों में पसरा हुआ उच्छृंखल मर्दवाद, एजेंडा सेटिंग का मीडिया उन्माद, ट्रायलवाद, श्रेष्ठता ग्रंथि, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, असुरक्षा, भाषा और कंटेंट का लिजलिजापन, इन गिरावटों की फेहरिस्त लंबी है।

असल में जिस तरह की प्रवृत्तियां सामने आ रही हैं उनमें समाज और उसमें भी सबसे वंचित तबकों को घेरने, उसे अपमानित करने, उन पर हमला करने और उन्हें खदेड़ने के लिए नवउदारवादी दबंगई की भरमार है। तेजपाल की झपटमारी हो या बीजेपी के ‘वीर' नेता विजय जॉली का तहलका की पूर्व प्रबंध संपादक शोमा चौधरी के घर के बाहर नारेबाजी और नेमप्लेट पर कालिख पोतने की हरकत या गुजरात का स्नूपिंग कांड या इससे पहले दिल्ली मुंबई, यूपी, असम और देश के कई हिस्सों में हुई-होती आ रहीं बलात्कार की जघन्य वारदातें। और पीछे चले जाएं- एक अंग्रेजी टीवी चैनल के स्वनामधन्यों की सोशल एक्टिविस्ट शबनम हाशमी और लेखिका अरुंधति रॉय के साथ बदसलूकी। एक चैनल का दिल्ली की शिक्षिका उमा खुराना का फर्जी स्टिंग. और पीछे भी जाएं तो 2002 के दंगों में महिलाओं पर हुई अकल्पनीय बर्बरता, 1992-93, 1984, 1947। आजाद भारत की तारीखों से भी पीछे जाएंगें तो आप स्त्री शोषण की भयावह दास्तानें पाते रहेंगे। अलग-अलग दौरों में ये समाज में वास्तविक घटनाएं हैं और इसी के समानांतर आप सिनेमा, टीवी, विज्ञापन यानी सभी किस्म के मास मीडिया में देखेंगे वहां महिलाओं को ज्यादातर किस रूप में पेश किया जा रहा है। कुल मिलाकर स्थितियां ठीक नहीं है। जरूरत जनचेतना की है। इस समस्या को ठीक से समझकर इसके निदान के लिए हर किसी को प्रयास करने की जरूरत है।

संपर्कः
आशा त्रिपाठी
पी-2, फ्लैट नं- 145
दीप गंगा अपार्टमेंट
सिडकुल, रोशनाबाद
हरिद्वार (उत्तराखंड)



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