कैसी रार, घर ही नहीं, घटक में भी दरार!
राजीव रंजन तिवारी  | अपडेटेड: Tuesday, Sep 2, 2014 at 11:16 pm EST

हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की तीन साल पुरानी सहयोगी पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) ने खुद को अलग कर लिया है। खास बात यह है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री और अमित शाह के भाजपा प्रमुख बनने के बाद एनडीए के घटक में यह पहली टूट है। मतलब ये कि अब घटकों में भी दरार पड़नी शुरू हो गई है। इससे पहले भाजपा संसदीय बोर्ड से अटल, आडवाणी और जोशी के बाहर होने की चर्चा पर पार्टी के भीतर यानी भाजपा के ‘घर’ में भी कोलाहल मचा हुआ है। कुल मिलाकर हालात अच्छे नहीं हैं। हालांकि इस स्थिति को भाजपा के बड़े नेता, जो अपने क्रियाकलापों से आत्ममुग्ध रहते हैं, भले खुश हों, लेकिन पार्टी के जमीनी स्तर के कार्यकर्ता व पदाधिकारी खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि जब अटल, आडवाणी व जोशी जैसे लोगों की उपेक्षा हो सकती है तो हमलोग किस खेत की मूली हैं। जरा सोचिए, साल 1990 में एक ट्रक को रथ की शक्ल देकर सोमनाथ से अयोध्या तक की यात्रा पर निकले लालकृष्ण आडवाणी ने क्या कभी सोचा होगा कि उनके रथ का जो सारथी है, वही एक दिन उनको रथ से उतार देगा? क्या 2002 में जब उन्होंने नरेद्र मोदी को राजधर्म न निभाने पर वाजपेयी के कोप से बचाते हुए अभयदान दिया था, तो सोचा होगा कि कभी नरेंद्र मोदी ही उनको परदे के पीछे पहुंचाने का काम करेंगे? नहीं ना, लेकिन देखिए क्या हो रहा है?
सबसे पहले चर्चा भाजपा संसदीय बोर्ड से बड़े नेताओं की रुखसती की। बेशक भारतीय राजनीति में आडवाणी की शख्सियत कई विडंबनाओं से बनी शख्सियत है। अपनी ऊर्जा और अपने आंदोलन से उन्होंने बीजेपी को शिखर तक पहुंचाया, लेकिन कभी ख़ुद शिखर तक नहीं पहुंच पाए। तब माना गया कि वाजपेयी की उदार छवि ने उन्हें आडवाणी से बड़ा नेता बना दिया। लेकिन जब ख़ुद आडवाणी ने उदार होने की कोशिश की तो पार्टी ने उनके साथ बहुत सख्त सलूक किया। जब पार्टी अपने दम पर बहुमत में आई तो इस पार्टी में आडवाणी की हैसियत ऐसे बुज़ुर्ग की रह गई जिसको सब मान देते हैं, लेकिन जिन पर कोई ध्यान नहीं देता। वैसे इस विडंबना को ठीक से देखें तो ये उनकी निजी नहीं राजनीतिक विडंबना भी है। सच तो ये है कि आज नरेंद्र मोदी की सख्त और कट्टर छवि ठीक वैसी है, जैसी कभी आडवाणी की हुआ करती थी। ये इत्तेफाक से ज़्यादा राजनीतिक प्रशिक्षण और विरासत का नतीजा है कि आडवाणी और मोदी दोनों खुद को लौह पुरुष पटेल की छवि में देखते हैं। फिर यह आडवाणी ने ही सिखाया कि दिल्ली क़रीब दिखे तो अयोध्या को भूल जाना चाहिए। आज अटल और आडवाणी से मुक्त बीजेपी एक नई पार्टी है। ये नरेंद्र मोदी के युग की बीजेपी है, जो राम मंदिर, अनुच्छेद 370 या समान नागरिक संहिता की बात नहीं करती। वह विकास की पैकेज में लपेट कर उस आक्रामक हिंदुत्व की बात करती है, जिसे अपने दबदबे के अलावा कुछ मंज़ूर नहीं। उसे राष्ट्रवाद चाहिए, लेकिन दकियानूसी और स्वदेशी परंपराएं नहीं, बल्कि ऐसा राष्ट्रवाद चाहिए जो बाज़ार को रास आए। इस बीजेपी में व्यवहार के आधार पर सिद्धांत गढ़े जाते हैं, सिद्धांत की कसौटी पर व्यवहार नहीं। ये नई बीजेपी नरेंद्र मोदी से ही शुरू होती है और उन्हीं पर ख़त्म होती है। आडवाणी को ये इशारा बार−बार दिया गया कि अब वह पार्टी में शोभा की वस्तु हैं, जिनके पांव छुए जाएंगे, लेकिन जिनसे राह नहीं पूछी जाएगी। फिर भी आडवाणी रास्ता दिखाने पर अड़े रहे। पार्टी ने आख़िरकार उन्हें ही रास्ता दिखा दिया। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा ।
बीजेपी ने जो मार्गदर्शक मंडल बनाया है इस मंडल का मार्ग क्या होगा और इसके दर्शनाभिलाषी कौन होंगे, किसी को पता नहीं। पांच सदस्यों के इस मंडल को इस कदर सजाया गया है कि लगे ही न कि ये इंतज़ाम सिर्फ आडवाणी या जोशी के लिए हुआ है। मार्गदर्शक मंडल का प्रावधान बीजेपी के संविधान में नहीं है। लेकिन जिस तरह से 21वीं सदी की सरकार के लिए बीसवीं सदी का योजना आयोग बेकार हो सकता है उस तरह बीसवीं सदी में बनी बीजेपी के लिए 21वीं सदी में एक नया आयोग तो बन ही सकता है। उसी नए आयोग का नाम है, मार्ग दर्शक मंडल। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सिर्फ मार्गदर्शक मंडल में हैं। अटल बिहारी वाजपेयी स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति में पिछले दस साल से नहीं हैं। बीजेपी के कायर्कर्ता तो अटल-आडवाणी कमल निशान, मांग रहा है हिन्दुस्तान- जैसे नारों की भावुकता से कब का दूर निकल चुके हैं। भाजपा के तीन धरोहर अटल, आडवाणी और मुरली मनोहर भी अब शायद आज के भाजपा कर्ताधर्ता भूल चुके हैं। सनद रहे कि एक साल पहले गोवा में पूरी बीजेपी मोदी-मोदी कर रही थी दिल्ली में आडवाणी अपना इस्तीफा लिख रहे थे। उनके बगैर शायद वह पहली राष्ट्रीय कार्यकारिणी होगी।  दिल्ली के मोदी विरोधियों को आडवाणी के इस इस्तीफे से काफी उम्मीद हो गई, मगर इस्तीफा वापस लेकर आडवाणी ने उन्हें कंफ्यूज़ कर दिया। आडवाणी ने चुनाव के बाद मोदी की खूब तारीफ भी की। इतना सब होने के बाद आडवाणी ने कभी क्यों नहीं कहा कि उनके संन्यास लेने का वक्त आ गया है। मार्गदर्शक मंडल के दूसरे सक्रिय पार्टनर हैं- मुरली मनोहर जोशी, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी के लिए बनारस की सीट छोड़नी पड़ी। कानपुर से जीत तो गए मगर मंत्रिमंडल में उम्र की पाबंदी लग गई। 87 साल के बलराम दास टंडन छत्तीसगढ़ और 82 साल के कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल बन गए मगर इनसे छोटे मुरली मनोहर जोशी रह गए। बीजेपी नई हो रही है। लगातार बदल रही है। अमित शाह जब अध्यक्ष बने तो उनकी टीम के साठ प्रतिशत लोगों की उम्र पचास साल या उससे कम है। कुछ इक्का दुक्का लोग ज़रूर साठ या सत्तर साल के हैं। मंत्रिमंडल में भी चंद अपवादों को छोड़ उम्र का पैमाना तय किया गया। यूं कहें कि बीजेपी में अटल-आडवाणी का युग अधिकारिक रूप से खत्म हो गया।
अब यदि ताजा घटनाक्रम के तहत हरियाणा की चर्चा करें तो पता चलेगा कि हरियाणा जनहित कांग्रेस के प्रमुख कुलदीप बिश्नोई की भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया है। भाजपा और हजकां में तीन साल से यारी थी। साथ-साथ चुनाव लड़ने और सरकार बनाने तक का समझौता था, लेकिन 28 अगस्त को तीन साल पुराने रिश्ते को खत्म करने की घोषणा करके कुलदीप विश्नोई ने सबको चौंका दिया है। कुलदीप बिश्नोई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बीजेपी को धोखा देने वाली पार्टी ठहराया है। उन्होंने अब विनोद शर्मा की पार्टी से तालमेल कर लिया है। कुलदीप विश्नोई ने कहा कि हमने गठबंधन धर्म निभाने की कोशिश की लेकिन बीजेपी ने हमेशा हमें नीचा दिखाने की कोशिश की। अब सवाल उठता है कि क्या भाजपा अपने बुरे दिनों के यारों को इसी तरह एक-एक कर निपटाती जाएगी। निश्चित रूप से इस तरह के सवाल अन्य घटक दलों को भी परेशान कर रहे होंगे। अब आगे देखना है कि भाजपा क्या-क्या करती है?
संपर्कः राजीव रंजन तिवारी, द्वारा- श्री आरपी मिश्र, 81-एम, कृष्णा भवन, सहयोग विहार, धरमपुर, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), पिन- 273006. फोन- 08922002003.



आपकी राय


Name Email
Please enter verification code