फेल हो गई मोदी-शरीफ की ‘डिनर डिप्लोमेसी’!
राजीव रंजन तिवारी  | अपडेटेड: Monday, Aug 25, 2014 at 02:32 am EST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी आमंत्रित किया गया था। यहां उनकी खूब आवभगत हुई। इससे दोनों देशों के संबंधों में सुधार की कुछ उम्मीद जागी थी। इसी क्रम में दोनों देशों के विदेश सचिवों के बीच 25 अगस्त को इस्लामाबाद में बातचीत होनी थी। शायद यही वजह रही कि पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच एक दूसरे पर आरोप लगाने की प्रवृत्ति भी कम देखी गई। 2008 में पाकिस्तानी इस्लामी संगठन लश्करे तय्यबा द्वारा मुंबई हमले के बाद से पहली बार उम्मीद की जा रही थी कि दोनों के बीच बातचीत के नए रास्ते खुलेंगे। लेकिन भारतीय विदेश सचिव सुजाता सिंह का प्रस्तावित दौरा रद्द करने के फैसले से तमाम उम्मीदों पर पानी फिर गया। इस बाबत भारत का कहना है कि पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित का भारत प्रशासित कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से बात करना पाकिस्तान की इस मुद्दे पर निष्ठा के बारे में सवाल खड़े करता है और भारत के प्रधानमंत्री की कूटनीतिक कोशिशों को प्रभावित करता है। हाल में कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर हुई ताजा भिड़ंतों ने मोदी को घेरे में खड़ा किया। जबकि हिन्दू राष्ट्रवादी नेता मोदी खुद को कमजोर दिखाने का जोखिम नहीं उठा सकते। उधर, इस समय नवाज शरीफ घरेलू स्तर पर विपक्षी नेता इमरान खान और मुस्लिम धार्मिक नेता कादरी के सरकार विरोधी प्रदर्शनों से घिरे हुए हैं। इसके पीछे मोदी की डिनर डिप्लोमेसी ही मानी जा रही है, जो उनके शपथ ग्रहण के दिन से शुरू हुई थी। यानी यह माना जा सकता है कि मोदी-शरीफ दौर की शुरुआती राजनीतिक लड़ाई में बाजी उन्होंने मार ली जो भारत पाकिस्तान संबंधों में सुधार के खिलाफ हैं। यह शरीफ और मोदी के लिए कड़ी चेतावनी है कि वह अपनी नीति छोड़ दें। लेकिन ये भी सच है कि दोनों नेताओं को अपनी आर्थिक समस्याओं से निपटने के लिए एक दूसरे की जरूरत है।
दरअसल, 67 वर्षों में दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच तीन युद्ध हो चुके हैं। 2008 में मुंबई हमले के समय दोनों देश युद्ध की कगार पर पहुंच गए थे। नि:संदेह भारत को लगता है कि इस्लामी चरमपंथी एक बार फिर कश्मीर में परेशानियां खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं और इसमें उन्हें पाकिस्तान का समर्थन हासिल है। हाल में कश्मीर दौरे पर मोदी द्वारा पाकिस्तान पर छद्म युद्ध छेड़ने के आरोप के पीछे यही आकलन था। उधर, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के लिए वार्ता का रद्द होना मुसीबत से कम नहीं। मोदी के शपथ ग्रहण में भारत आकर उन्होंने पाकिस्तान में अपनी इज्जत दांव पर लगा दी थी। इस प्रक्रिया में उन्होंने ताकतवर पाकिस्तानी सेना और आईएसआई को चुनौती देने का खतरा तक मोल लिया। पाकिस्तानी विदेश एवं सुरक्षा मामलों में उनका प्रभाव दोनों देशों के बीच तनाव बनाए रखने पर निर्भर है। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने खुद दोनों देशों के बीच व्यापारिक और राजनीतिक संबंध बेहतर बनाने में दिलचस्पी जताई। उन्हें उम्मीद थी कि इससे दोनों देशों को फायदा होगा और पाकिस्तान की आर्थिक हालत सुधारने में उन्हें मदद मिलेगी। हालांकि इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि पाकिस्तानी खुफिया सेवा आईएसआई ने कश्मीर में अस्थिरता पैदा करने के लिए इस्लामी आतंकवादियों को ट्रेनिंग और आर्थिक मदद दी है। सीमा पर ताजा हमलों का ऐसे समय पर होना कोई इत्तेफाक नहीं। इससे हिन्दू राष्ट्रवादी नेता मोदी को उकसाने का मौका तो मिलता ही है । साथ ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की शर्मिंदगी की गारंटी भी होती है जो इस समय घरेलू स्तर पर विपक्षी नेता इमरान खान और मुस्लिम धार्मिक नेता कादरी के सरकार विरोधी प्रदर्शनों से घिरे हुए हैं। दोनों को ही संदिग्ध रूप से सेना का करीबी समझा जाता है।
हालांकि पाकिस्तान ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लगाए गए छद्म युद्ध छेड़ने के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा था कि एक दूसरे पर इल्जाम लगाने की बजाय सकारात्मक रवैया जरूरी है। उच्चतम राजनीतिक स्तर पर भारत द्वारा लगाए गए आरोप के बारे में खबरें बहुत अफसोसनाक बात हैं। कश्मीर के उत्तर पूर्व में स्थित कारगिल भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में हुए युद्ध का साक्षी है। भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध के 15 साल बाद यह कारगिल में पहले प्रधानमंत्री की यात्रा थी। यात्रा के दौरान मोदी ने भारतीय सेना को और हथियार मुहैया कराने की भी बात कही। उन्होंने कहा कि युद्ध से ज्यादा हादसे आतंकवाद के कारण हो रहे हैं। 1989 से अब तक सैन्य और आतंकवादी संघर्षों में हजारों जानें जा चुकी हैं। 15 साल पहले दोनों देशों के बीच हुआ कारगिल युद्ध भी हजारों की मौत का गवाह बना। कश्मीर में आतंकवादी सरगर्मियों के लिए भारत लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों का इस्तेमाल करने के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराता रहा है। पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार करता आया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक कश्मीर में शांति के लिए यह ज्यादा अच्छा होगा कि आरोप प्रत्यारोप करने की बजाय दोनों देश अपने संबंधों को बेहतर करने पर ध्यान दें। इसके लिए उन्हें बातचीत और एक साथ काम करने की जरूरत है ताकि सहयोगी और मैत्री संबंधों को बढ़ावा मिल सके। कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच बंटा हुआ है, लेकिन दोनों ही देश इसे पूरी तरह अपने अधिकार में लेना चाहते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए तीन में से दो युद्ध दोनों देशों के बीच विवादित कश्मीर क्षेत्र को लेकर हो चुके हैं। कश्मीर के अलगाववादी भारत से अलग होना चाहते हैं और इस मुद्दे पर 1989 से संघर्ष चला आ रहा है।
भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सुधरने की संभावना ज्यों प्रबल होती है तभी कुछ-न-कुछ ऐसा हो जाता है कि वे फिर से तनावग्रस्त हो जाते हैं। 19 फरवरी, 1999 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बस द्वारा लाहौर पहुंच कर जो इतिहास रचा था और यात्रा के अंत में जारी लाहौर घोषणा-पत्र से जो उम्मीद बंधी थी, वह कारगिल युद्ध के कारण ध्वस्त हो गई। 6 जनवरी, 2004 को पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखित आश्वासन दिया कि पाकिस्तान के नियंत्रण वाली भूमि से भारत विरोधी कार्रवाई नहीं होने दी जाएगी। लेकिन इसके बाद मुंबई हमले हो गए जिन्होंने सब उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ-ग्रहण समारोह मं् सभी सार्क शासनाध्यक्षों के साथ-साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी शरीक हुए तो लगा कि एक बार फिर दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने की प्रक्रिया गंभीरता के साथ आगे बढ़ाई जाएगी। इसके बाद जब यह घोषणा हुई कि भारत की विदेश सचिव सुजाता सिंह और पाकिस्तान के विदेश सचिव ऐजाज अहमद चौधरी के बीच 25 अगस्त, 2014 को इस्लामाबाद में वार्ता होगी, तो इस आशा को और भी बल मिला। लेकिन अंत में यह भी रद्द हो गया। इसमें कोई शक नहीं कि नवाज शरीफ और पाकिस्तान का उद्योग एवं व्यापार जगत भारत के साथ रिश्ते सुधारना चाहते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का पूरी तरह एहसास हो गया है कि तनावपूर्ण रिश्ते किसी के भी हित में नहीं हैं। बहरहाल, यह कह सकते हैं मोदी और शरीफ ने जिस डिप्लोमेसी के साथ रिश्तों में सुधार की कोशिश की थी, वह डिप्लोमेसी फ्लाप हो गई।
संपर्कः राजीव रंजन तिवारी, द्वारा- श्री आरपी मिश्र, 81-एम, कृष्णा भवन, सहयोग विहार, धरमपुर, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), पिन- 273006. फोन- 08922002003.



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