पाकिस्तान में गहराते सियासी संकट का मतलब
राजीव रंजन तिवारी  | अपडेटेड: Sunday, Aug 17, 2014 at 07:40 am EST

पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में लगातार सियासी संकट गहरा रहा है। वहां की नवाज शरीफ की हुकूमत की राह में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के मुखिया इमरान ख़ान और पाकिस्तानी अवामी तहरीक पार्टी के मुखिया ताहिर उल-कादरी कांटे बोते जा रहे हैं। इमरान खान ने तो यहां तक कह दिया है कि उनका विरोध प्रदर्शन तबतक जारी रहेगा जबतक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ इस्तीफ़ा नहीं दे देते। उधर, प्रमुख धार्मिक नेता ताहिरउल क़ादरी ने भी शरीफ़ को पद छोड़ने के लिए 48 घंटों का वक़्त दिया है। दोनों नेताओं ने अपनी रैलियां लाहौर से शुरू की थी। इमरान ने कहा है कि शरीफ़ के इस्तीफ़ा न देने की सूरत में वो प्रधानमंत्री निवास तक मार्च करेंगे। उनका कहना था कि वो प्रधानमंत्री से प्यार से कह रहे हैं कि इस्तीफ़ा दे दें वरना 'सूनामी' प्रधानमंत्री निवास तक भी आ सकता है। इमरान शरीफ़ पर चुनाव में धांधली कर सत्ता में आने का आरोप लगा रहे हैं। मतलब ये कि पाकिस्तान के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं, जिसकी परिणति देर-सबरे तख्ता-पलट ही है। क्योंकि सेना से हमेशा ही नवाज शरीफ का रिश्ता 36 का रहा है। इसलिए समझा जा रहा है कि सेना विपक्ष का साथ दे सकती है।
पिछले दिनों पाकिस्तानी विपक्ष द्वारा शुरू किया गया आज़ादी मार्च असर दिखा सकता है। अभी तक तो सरकार और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी ज़िद्द पर अड़े हुए हैं। विपक्ष प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े की मांग कर रहा है और सरकार कह रही है कि वह देश में अराजकता और उथल-पुथल नहीं होने देगी। सरकार भी और विपक्ष भी सेना का समर्थन लेने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तानी सेना ने अभी तक चुप्पी साध रखी है। लेकिन यह बात साफ़ होती जा रही है कि इस विवाद में उसे ही आख़िरी निर्णय लेना होगा। इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इन्साफ़ पार्टी और ताहिर उल-कादरी की पाकिस्तानी अवामी तहरीक पार्टी के हज़ारों समर्थक पाकिस्तान के पंजाब सूबे की राजधानी लाहौर से इस्लामाबाद पहुंचकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। जानकार मानते हैं कि यह प्रदर्शन लम्बे समय तक चलेगा। कम से कम आगामी सप्ताहन्त तक तो खिंचेगा ही। हालांकि विपक्षी नेताओं का कहना है कि वे तब तक प्रदर्शन करते रहेंगे, जब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो जाती और प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ अपने पद से इस्तीफ़ा नहीं दे देते। दूसरी तरफ़ वे यह भी कह रहे हैं कि उनका यह प्रदर्शन शान्तिपूर्ण प्रदर्शन होगा। लेकिन सूचना मिल रही है कि यह प्रदर्शन पूरी तरह से शान्तिपूर्ण नहीं रह पाया है। पाकिस्तान तहरीक-ए-इन्साफ़ पार्टी और सत्तारूढ़ दल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के समर्थकों के बीच टकराव हो रहे हैं।
दूसरी तरफ़ सरकार पूरी तरह से अपनी ज़िद्द पर अड़ी हुई है। योमे आज़ादी के अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने कहा था कि मुल्क अब तोड़-फोड़ (की कार्रवाइयों) और मनफ़ी सियासत को (यानी नकारात्मक राजनीति को) और ज़्यादा सहन नहीं कर सकता है। योमे आज़ादी के दिन क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना के संग्रहालय का उद्घाटन करते हुए सेनाध्यक्ष रहील शरीफ़ की उपस्थिति में नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि सच्चा मार्च तो यहां हो रहा है, बलूचिस्तान में। जहां मुल्क के नागरिक संचालक और फ़ौजी संचालक मिलकर योमे आज़ादी का दिन मना रहे हैं। अभी तक इस हालत के बारे में पाकिस्तान की फ़ौज ने कुछ नहीं कहा है। हालांकि ज़्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फ़ौज के नज़रिए पर ही यह तय होगा कि सरकार और विपक्ष का एक-दूसरे के ख़िलाफ़ ताल ठोंकने का नतीजा क्या होगा। प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और फ़ौज में पुरानी अनबन है । पिछली सदी के आख़िरी दशक में भी फ़ौज ने नवाज़ शरीफ़ से प्रधानमंत्री का पद छीन लिया था और उन्हें सत्ताच्युत कर दिया था। पीपुल्स पार्टी की पिछली सरकार के दौर में भी सेना और सरकार के बीच तनातनी चली थी। हालांकि बाहरी लोगों को उसकी भनक भी नहीं लग पाई थी। फ़ौज और सरकार के बीच तनातनी आज भी दिखाई दे रही है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की पिछली सरकार के सत्ताकाल में और आज भी सेना राजनीति में कोई रुचि नहीं ले रही है व वह संविधान के प्रति प्रतिबद्ध बनी हुई है। लेकिन सरकार भी यह जानती है और पाकिस्तानी विपक्ष भी यह जानता है कि सेना ही देश की सबसे प्रभावशाली ताक़त है। इसलिए दोनों के बीच सेना को अपनी तरफ़ करने की होड़ मची हुई है।
सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तानी गुप्तचर संगठन आईएसआई और पाकिस्तानी सेना विपक्षी नेताओं के साथ हैं। पाकिस्तानी अवामी तहरीक के नेता ताहिर उल-कादरी ने तो सेना से सीधे-सीधे यह अपील की है कि वह सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ले। हालांकि उन्होंने इस बात से भी इंकार किया है कि फ़ौज उनके आन्दोलन का समर्थन कर रही है। फ़ौज फ़िलहाल इंतज़ार कर रही है। अब सिर्फ़ दो ही रास्ते बचे हुए हैं। या तो सेना के संचालक सरकार को पीछे हटने के लिए मज़बूर कर देंगे और सरकार परवेज़ मुशर्रफ़ को मुल्क छोड़ने की इजाज़त दे देगी, तब फ़ौज नवाज़ शरीफ़ को अपना समर्थन देने लगेगी। प्रदर्शन को ख़त्म करने के लिए सरकार के द्वारा साफ़-साफ़ अपने नज़रिए की घोषणा करना ही काफ़ी होगा। या फ़िर यदि सरकार अपनी ज़िद्द पर अड़ी रही तो सेना खुलेआम कोई हस्तक्षेप न करते हुए प्रदर्शनकारियों को ऐसा करने देगी कि वे प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा ले लें। फ़ौज सिर्फ़ एक चीज़ की इजाज़त नहीं देगी कि देश में अराजकता फैल जाए। एटमी हथियार रखने वाले इस मुल्क में उथल-पुथल होने से और मुल्क के टूटने से न सिर्फ़ पाकिस्तान के लिए ही भारी ख़तरा पैदा होगा, बल्कि सारी दुनिया के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा। इस परिस्थिति में सेना का राजनीति में हस्तक्षेप शान्ति के हित में होगा।
इसी बीच लाहौर हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने इमरान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ और कादरी की पाकिस्तान अवामी तहरीक को इस्लामाबाद में असंवैधानिक रैली निकालने और धरने पर बैठने से परहेज करने का आदेश दिया था। फिर भी सरकार के विरुद्ध विपक्षी पार्टियों में आक्रोश फैलता जा रहा है। इस्लामाबाद में विपक्षी पार्टी पाकिस्तान तरहीक-ए-इंसाफ के लीडर इमरान खान के नेतृत्व में 60 हज़ार से अधिक लोग सरकार विरोधी मार्च में भाग ले रहे हैं, जो पिछले दिनों ही शुरू हो गया था। बहरहाल, इन सबके बीच पाकिस्तानी सेना पर भी नजर लगी हुई है, जिसने ज्यादातर समय पाकिस्तान पर राज किया है और नवाज शरीफ के खिलाफ 1999 में सैनिक तख्ता पलट हो चुका है।
संपर्कः राजीव रंजन तिवारी, द्वारा- श्री आरपी मिश्र, 81-एम, कृष्णा भवन, सहयोग विहार, धरमपुर, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), पिन- 273006. फोन- 08922002003.



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