‘आधी आबादी’ को कितनी आजादी
आशा त्रिपाठी  | अपडेटेड: Thursday, Aug 14, 2014 at 07:51 am EST

देश को आजाद हुए 67 वर्ष हो गए। देश आज आजादी का जश्न मना रहा है। इस जश्न के शोर में शायद ही किसी को चिन्ता हो कि महिलाओं की आजादी के बारे में सोचे। जबकि हर कोई जानता है कि विश्व निर्माण में स्त्री की भूमिका निर्विवाद है। स्त्री न होती तो आदमी की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। दुनिया को बदतर बनाने में आदमी यानी पुरुष की जितनी भूमिका है उतनी औरतों यानी महिलाओं की नहीं। तस्करी, धोखेबाजी, षड्यंत्र, तिकड़मबाजी के अलावा, जितने भी बुरे काम हैं, तुलनात्मक रूप से अध्ययन करें तो औरतों की हिस्सदारी बहुत कम है। 'इनसाइक्लोपीडिया ऑफ मर्डर' के पन्ने बताते हैं कि नाकारात्मक कार्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी ना के बराबर है। यूं कहें कि दुनिया को बिगाडऩे के काम में स्त्री की हिस्सेदारी कितनी कम है। इस स्थिति में यह अपेक्षा की जाती है कि अच्छे कामों में महिलाओं की भागीदारी बढ़े। पुरुषों की तरह ही महिलाओं को भी पूरी आजादी मिले। देश में अभी भी स्त्री को कई क्षेत्रों में पुरुष जैसी आजादी नहीं है। सबके बावजूद औरतों ने यह सिद्ध किया है कि लिंगगत कुछ भिन्नताओं के अलावा स्त्री और पुरुष में ज्यादा अंतर नहीं है। पुरुष विरोधी वर्चस्व के लिए समर्पित एक स्त्री का मानना है कि भविष्य में पुरुष की नियति एक बैल की तरह निर्धारित हो जाएगी। वह निरंतर बोझा ढोने जैसे कामों के लिए उपयुक्त है।
प्राचीनकाल में गणितज्ञों के रूप में महिला गणितज्ञ की चर्चा होती है किंतु पुरुष वर्चस्व के कारण स्त्रियों को वह मान्यता नहीं मिली जो एक तरह की सामाजिक स्वीकृति कही जाए। भारत में स्वाधीनता संग्राम में गांधी जी की प्रेरणा से वे घर से बाहर आईं और उन्होंने आजादी को लेकर खुले रूप में अपनी भागीदारी और सहभागिता निभाई। इसी को लक्ष्य कर महात्मा गांधी ने अपने आंदोलनात्मक कार्यों में भाषा के रूप में हिंदी को जहां महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, वहीं स्त्री की समाज बदलने और पुनर्निर्माण की भूमिका का महत्व समझते हुए अपने आंदोलन में व्यापक रूप से उन्हें शामिल किया। यही नहीं, गांधीवादी सिद्धांतों में स्त्री के प्रति स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्त्री मात्र भोग विलास की वस्तु नहीं, वह भी पुरुष की तरह ही मूल्यवान है। उसके भी मनोलोक में वही गुजरता है, जो पुरुष के मनोलोक में गुजरता है। अर्थ यह कि इस मैथुनी सृष्टि के विकास में दोनों (महिला-पुरुष) एक-दूसरे के पूरक हैं। परंतु आदमी ने स्त्री को अपूर्ण घोषित किया है। सारे धर्मग्रंथ यही सामग्री हम तक पहुंचाते हैं या हमारे धर्मग्रंथों की व्याख्या करने वाले बाबा, मुल्ले और पादरी अपने विकलांग मस्तिष्कों से ऐसे फतवे जारी करते रहते हैं जो आधी आबादी की आजादी में बाधक तत्व की तरह हैं। तथाकथित नागरिक समाज भी इस बड़े प्रश्न से नहीं टकराता। हिंदी लेखन में स्त्रियों की भागीदारी 20वीं सदी के बाद बढऩी शुरू हुई है। उनमें कुछ एक दृष्टांत जो बहुत चर्चा में रहे हैं, उनकी पड़ताल करें तो दिलचस्प निष्कर्ष सामने आते हैं। स्त्री की स्वतंत्रता सिर्फ यौन स्वछंदता तक सीमित कर दी गई है। स्त्री को, हमारे समाज का नया-नया विरसित समाचार माध्यम भी एक उत्पाद की तरह देखने की दृष्टि से परोस रहे हैं। अनजाने में वह भी सही मुद्दों को रेखांकित करने की बजाए धर्मगुरुओं का साथ ही दे रहे हैं।
मौजूदा हालात में महिलाओं की दशा को देखें तो वह और भी बदतर नजर आएगी। यद्यपि लोग महिलाओं को शक्ति, सरस्वती, लक्ष्मी और न जाने कितनी उपाधियों से नवाजते हैं। महिलाएं मां, बहन, पत्नी, सखी होती हैं । लेकिन आजादी के पंख फैलाने के लिए आज भी तरस रही है। भारत माता को तो आजादी के दीवानों ने 1947 में अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ा लिया। लेकिन महिलाएं अपने ही देश में पैदा हुए दानवों के पैरों तले आज भी पिस रही हैं। आज भी महिलाओं के पांवों में बेड़ियां हैं। आंख में आंसू हैं। कभी कोई दरिंदा आबरू तार-तार करता है, तो कोई तेजाब फेंक चेहरे के साथ सारे सपने ही जला डालता है। गैरों की बात क्या करें, अपने ही दुश्मन बने बैठे हैं। न जाने कितनी ही आंखों को खुलने से पहले ही कोख में भी बंद कर दिया जाता है। कड़वा सच यह है कि आजादी के 67 साल बाद भी महिलाएं गुलाम हैं। तड़प रही हैं। लड़ रही हैं। जूझ रही हैं। खुद के अस्तित्व के लिए। हालांकि बीते कुछ वर्षों में महिलाओं ने तरक्की के कई मुकाम हासिल किए। फिर भी उनके खिलाफ अपराध का ग्राफ भी बढ़ता चला गया। सिर्फ 2012 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 2 लाख 44 हजार 270 मामले दर्ज किए गए। इस आजाद देश में घर से निकलते डर लगता है। न जाने कितने ही गिद्ध जिस्म नोचने को आंखें गड़ाए बैठे हैं। हजारों मां-बहनों की आबरू तो पिछले एक साल में ही तार-तार हो गई। लेकिन क्या घर की चारदीवारी महिलाओं के लिए महफूज है। लगता तो नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े महिलाओं पर अपनों के सितम की कहानी बयां करते हैं। वर्ष 2012 में ही 1,06,527 मामलों में महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार बनी। बस एक ही सपना है आंखों में। पंख फैलाए उन्मुक्त गगन में ऊंची उड़ान भरने की। जहां खौफ न हो खुद के लुट जाने का।
भारत में आज 11 फीसदी महिलाएं सीईओ के पद पर काम कर रही हैं। जबकि अमेरिका व ब्रिटेन में यह आंकड़ा महज तीन फीसदी है। भारतीय कंपनियों के निदेशक मंडल में 30 फीसदी महिला निदेशक हैं, जो कि अमेरिका में यह आंकड़ा महज 16.34 है। इसके अलावा संसद से लेकर सड़क तक हर कदम पर महिलाएं आगे बढ़ने को प्रयासरत हैं।  जबकि सच्चाई यह है कि महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक माने जाने वाले देश में भारत चौथे नंबर पर है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में कम उम्र में लड़कियों की शादी के 40 फीसदी मामले भारत में हैं। देश में हर 20 मिनट में रेप की घटना होती है। देश की आधी आबादी आज भी असुरक्षित है। हर उम्र की महिलाएं रोज चुभती आंखों को झेलते हुए निकलती हैं। चार साल की बच्ची से लेकर 60 साल की वृद्धा तक से बलात्कार करने की खबरें आती हैं। क्या गरीब, क्या अमीर, हर वर्ग की महिलाओं की यह साझा समस्या है। क्या महिलाएं सम्मान से जीने की आजादी की हकदार नहीं हैं? और जिस 'आधी आबादी’ को जन्म ही नहीं लेने दिया जाता, उसका क्या? कन्या भ्रूण हत्याएं सबसे ज्यादा भारत में ही होती हैं। उन अजन्मी बच्चियों की कथा कौन महसूस करेगा, जिनसे जन्म लेने की आजादी भी छीन ली जाती है। इसलिए तमाम बेड़ियों में बंधी महिलाओं को भी आजाद करने की जरूरत है।
(संप्रति: लेखिका उत्तर प्रदेश में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी हैं।)
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