पाकिस्तान में डरे, सहमे और सिकुड़ते अल्पसंख्यक
मुकेश तिवारी  | अपडेटेड: Tuesday, Aug 12, 2014 at 07:47 am EST

मुकेश तिवारी - पिछले दिनों अहमदी मुस्लिम समुदाय पर हुए कायराना हमले ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ किये जा रहे अमानवीय व्यवहार की स्थिति को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है, लेकिन इस बार यह चर्चा किसी हिन्दू, क्रिश्चियन या शिया समुदाय पर हुए हमले की नहीं हो रही है बल्कि खुद को मुसलमान कहने वाले अहमदी समुदाय की हो रही है । 27 जुलाई 2014 को पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के गुजरांवाला में भीड़ ने अहमदी समुदाय पर हमला कर तीन महिलाओं की हत्या कर दी और आठ अन्य लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया। मरने वालों में से एक की उम्र 57 साल थी, दूसरी ७ साल की बच्ची थी और तीसरी तो अबोध बालिका थी जिसने बोलना-चलना भी अभी नहीं सीखा था।
भीड़ इस बात से खफा थी कि अहमदी समुदाय के एक युवा ने अपने फेसबुक पेज पर मुस्लिम धर्म को लेकर कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। अब यह तो वह भीड़ या फिर उसे उकसाने वाले ही बता सकते हैं कि एक तीन, सात और सत्तावन साल की महिलाऐं उनके धर्म को क्या नुकसान पहुंचा सकती थीं। और वो भी उस समुदाय की जिसके सदस्यों की संख्या देश की बहुसंख्यक आबादी की तुलना में नगण्य है। पाकिस्तान को कई मानवाधिकार संगठनों द्वारा धार्मिक मामलों में सबसे काम सहनशील दर्शाने वाले देशों में शुमार किया जाता है।
वर्तमान घटना को दशकों में विकसित हुए एक दुखद ढांचे के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। विडंबना यह है कि जिस व्यापक असहिष्णुता के साथ पाकिस्तान को जोड़कर देखा जाता है उसकी कल्पना तो उसके संस्थापक कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना ने भी नहीं थी। जिन्ना के शब्दों में "एक ऐसा समय आएगा जब हिन्दू, हिन्दू नहीं रहेगा और मुसलमान, मुसलमान नहीं रहेगा। ऐसा धार्मिक अर्थों में नहीं होगा क्योंकि धार्मिक आस्था व्यक्तिगत निर्णय है, बल्कि राजनीतिक अर्थ में होगा जहाँ सारे केवल पाकिस्तानी होंगे।"
अहमदी खुद को मुस्लिम कहते हैं लेकिन उनकी एक मान्यता इस्लाम के खिलाफ है। उनके अनुसार क़दिना के मिर्जा गुलाम अहमद अंतिम रबी या मसीहा हैं जबकि रूढ़िवादी 'ख़त्म-ए-नबुव्वत' मान्यता के अनुसार मोहम्मद साहब अंतिम पैगंबर थे। पाकिस्तान और विशेषकर पंजाब में धार्मिक और राजनीतिक समूहों द्वारा अहमदी विरोधी आंदोलन को ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।
अहमदियों पर लगातार बढ़ाते हमलों के बीच 1974 में पाकिस्तान की संसद ने एक क़ानून पास कर अहमदियों गैर-मुस्लिम करार दे दिया गया। तर्क यह दिया गया कि ऐसा करने से उनके रूढ़िवादी मुस्लिम आलोचक संतुष्ट हो जाएंगे और अहमदी विरोधी हिंसा में गिरावट होगी। लेकिन ऐसा न होना था और न ही हुआ। अहमदियों पर हमले लगातार बेरोकटोक जारी रहे और उन्हें अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के साथ हाशिये पर धकेल दिया गया। या तो उनका धर्म परिवर्तित कर दिया गया या पाकिस्तान से बाहर धकेल दिया गया।
पाकिस्तान में अहमदी समुदाय की अस्वीकार्यता की हद इस बात से जानी जा सकती है कि उसके सबसे गुणी बेटों में से एक डॉ. मोहम्मद अब्दुस सलाम को उनके अपने देश ने ही ठुकरा दिया। भौतिक विज्ञानी डॉ। सलाम विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले और एकमात्र पाकिस्तानी के साथ ही दुनियां के पहले मुस्लिम भी थे। 1996 में उनकी मृत्यु के बाद, सलाम के अवशेष उनकी समाधि दफना दिए गए जिस पर लिखा था "सबसे पहले मुस्लिम नोबेल पुरस्कार विजेता।" बाद में एक जज ने समाधी से मुस्लिम शब्द को यह कहते हुए हटाने के आदेश दिए कि यह इस्लाम और कानून का अपमान है । शायद वो जज यह भूल गया कि जब जिन्ना से अहमदियों को गैर-मुस्लिम करार देने के संबंध में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था "अगर कोई खुद को मुसलमान कहता है तो मैं कौन होता हूँ उसे रोकने वाला। इसका फैसला खुद पर छोड़ देना चाहिए।"
वर्तमान समय में अहमदी खुद को मुसलमान नहीं बुला सकते और न ही वे 'मस्जिद' की तरह इस्लामी शब्दावली का उपयोग कर सकते हैं। इस नियम का उल्लंघन करने पर आपराधिक कार्यवाही और कारावास की सजा दी जा सकती है। लेकिन इस समुदाय को एक गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक के रूप में कोई भी कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है। साल 2012-2013 में एक से डेढ़ साल की अवधि के दौरान अहमदियों पर भीड़ द्वारा हमले किये जाने के 54 मामले दर्ज किये गए हैं, जबकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इससे कई गुना मामले तो ऐसे हैं जिनकी कभी कोई रिपोर्ट या तो लिखी नहीं जाती या डर के मारे लिखे नहीं जाती।
यह घटना इस मायने में भी बहुत अहमियत रखती है कि यह रमज़ान के पाक महीने में घटी है। वह महीना जिसमे रोज़ा रखा जाता है, जिसमें बुरा काम करना तो दूर बुरा सोचने पर भी रोज़ा टूट जाता है। घटना के बाद भीड़ सडकों पर इस हमले का उत्सव मानते दिखाई दी जिसका वीडियो यूट्यूब पर देखा जा सकता है। लेकिन पंजाब से आने वाले प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और उनके पंजाब के मुख्यमंत्री भाई ने इस घटना के संबंध में एक शब्द भी नहीं कहा। यह घटना दर्शाती है कि पाकिस्तान के बहुसंख्यक सुन्नियों के दिलों में अल्पसंख्यकों के प्रति हमदर्दी या सहनशीलता तो दूर की बात है, कितनी नफ़रत और भेदभाव है।



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