‘ऑफ़बीट’ कल्पनाओं के आकाश खोलते संवेदनशील कवि गुलज़ार
सलिल दलाल  | अपडेटेड: Thursday, Apr 24, 2014 at 04:20 pm EST

फ़िल्मी कविता के चाहने वालों के लिए पिछले दिनों सबसे अच्छे समाचार थे..... गुलज़ार साहब को ‘दादासाहेब फ़ाळके पुरस्कार’ की हुई घोषणा! वैसे तो फ़रहान अख़्तर की ‘भाग मिल्खा भाग’ या फिर अरशद वारसी की ‘जॉली एल.एल.बी.’ जैसी मुख्यधारा की कही जाने वाली फ़िल्मों को राष्ट्रीय सम्मान मिलना भी खुशी की ही खबर थी। परंतु, ‘दादासाहेब फ़ाळके पुरस्कार’ जैसा फ़िल्मों के कलाकारों को दिया जाने वाला सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान एक गीतकार को मिले उसका आनंद विशीष्ट हो यह स्वाभाविक है। क्योंकि अपने शब्दों से फ़िल्मी दुनिया की सेवा करने वालों को  शायर कहें या कवि  या फिर नग़्मानिगार उन सबकी बरसों तक उपेक्षा होती रही थी। उन्हें ‘स्टार’ जैसा मान-सम्मान कहां मिलता था? उन्हें तो ‘मुन्शी’ (या बहुत अच्छे लोग हुए तो ‘मुन्शीजी’) कहकर काम दिया जाता था।  
मगर असल में उनका काम सबसे कठिन होता था। जैसा कि गीतकारों के बारे में लिखी अपनी किताब ‘गाता रहे मेरा दिल’ में हमने लिखा है, उनका सृजन आम कविओं से अलग और मुश्किल स्थितिओं में होता था। इन कविओं को मनचाहा लिखने की स्वतंत्रता हमेशा नहीं होती थी। अपने खुद के विचारों को अलग रखकर कहानी की मांग के अनुसार लिखना होता था। इस लिए, साहिर जैसे वामपंथी नास्तिक को “वक्त से दिन और रात, वक्त से कल और आज, वक्त की हर शय गुलाम...” जैसा भाग्यवादी गाना लिखना पडा था। ये तो साहिर की कलम का कमाल था कि उस में से “कौन जाने किस घडी वक्त का बदले मिजाज़....” जैसी पंक्तियां उतरतीं थीं, जो कि श्रोता को सहजता से फ़िल्म के केन्द्रवर्ती विचार के करीब रख देतीं थीं और सुनने वाले को पता तक नहीं चलता था कि लिखने वाले शायर खुद प्रारब्धवादी नहीं थे।
दुसर्व ये, कि समय मर्यादा में लिखना होता था। यानि खुद का मूड हो न हो, रेकोर्डिंग के लिए संगीतकार, गायक, म्युझिश्यन्स सब की तारीखें मिल गई हों और स्टुडियो बुक हो गया हो तो रिहर्सल के लिए वक्त पर गीत लिखकर देना पडता था। डेडलाईन को संभालते हुए शैलेन्द्र जैसे कविने “दोस्त दोस्त ना रहा...” या फिर “किसी की मुस्कारहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है....” जैसे अर्थपूर्ण गीत लिखे थे। (यहां ‘अर्थ’ का अर्थ ‘आर्थिक’ वाला अर्थ भी है.... उस म्युझिक का बिज़नेस उन फ़िल्मों के साथ जुड़े लोगों को मालामाल करने वाला भी होता था।) उपर से आलम ये कि एक-दो को छोड लगभग सभी गीतकार पुरुष होते थे। मगर महिला पात्रों के मनोभाव को किसी स्त्री से भी अधिक संवेदनशीलता से व्यक्त करते थे। जब आप ‘अनिता’ का गीत “मैं देखुं जिस ओर सखी रि, सामने मेरे सांवरिया...” या ‘खानदान’ का  गीत “तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही मेरी पूजा, तुम्ही देवता हो...” सुनते हैं तब ये अंदेशा भी नहीं होता कि दोनों रचनाएं पुरुषों ने लिखी थी । एक के शायर राजा मेंहदी अली खां थे और दुसरे के राजिन्दर क्रिश्न जी!  
इसी तरह से गुलज़ार जी की ‘इजाज़त’ फ़िल्म की रचना “मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पडा है...” और उसमें आते ये शब्द, “गिला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो, वो भिजवा दो, मेरा वो सामन लौटा दो...”   सुनकर लगता है कि वह किसी भग्न ह्रदयी प्रेमिका की भेजी हुई सूची है। इस लिए हमारा ये मत बरसों से रहा है कि फ़िल्मी गीत-लेखन भी साहित्य का ही एक प्रकार है। साहित्य का प्रकटीकरण गुलज़ार जी की बहुधा फ़िल्मी कविताओं में होता है। उनका नज़रिया लिक से हटकर रहता है। वे हमारे सही मायनों में ‘ऑफ़बीट’ गीतकार हैं। उनको यह विशेषण उनकी बहुचर्चित रचना “हमने देखी है उन आंखों की महकती खुश्बु, हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो....” के बाद से ऐसा लगा है कि आज भी वे सच्चे कविता प्रेमीओं के प्रिय कवि हैं। उस गीत में प्रेम की व्याख्या करते हुए गुलज़ार साहब की कलम से निकली ये पंक्ति तो देखीए? “नूर की बुंद है, सदियों से बहा करती है...”!
गुलज़ार ने ‘प्रेम के एहसास’ को परम तत्व की पावन बुंद बताकर ‘फ़िल्मी गीत’ कह कर उपेक्षित होने वाले इस काव्य प्रकार में आध्यात्म की ऊंचाई दिखाई थी। इस गीत की मज़ेदार बात ये है कि उसे लिखा गया था एक पुरुष पात्र के लिए और संगीतकार हेमंतकुमार ने आग्रह रखा कि उसे लता मंगेशकर से ही गवाया जाय। लताजी के गले की मीठाश है कि आज भी गुलज़ार की ये कविता नारी मन की अभिव्यक्ति की श्रेष्ठतम रचनाओं में समाविष्ट हो सकती है। वही गुलज़ार ‘आंधी’ में लिखे कि “जीने की तुम से वजह मिल गई है, बड़ी बेवजह ज़िंदगी हा रही थी....”  या ‘मासूम’ में “तुझ से नाराज़ नहीं जिंदगी हैरान हुं...” तब फ़िल्मी गीतों में ज़िंदगी से संबंधित गानों में नये आयाम खुलते लगते हैं।

इसी तरह से ‘सीमा’ के गीत “जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आसपास होता है...” के एक अंतरे में वे कहते हैं, “कोई वादा नहीं किया लेकिन, क्यूं तेरा इंतज़ार रहता है...” और फिर आता है मास्टर स्ट्रोक, “बेवजह जब करार मिल जाये, दिल बड़ा बेकरार रहता है...”। लेकिन अपने सृजनात्मक काम के लिए पब्लिसिटि बटोरे बिना एक से बढ़कर एक अच्छे गाने लिखने वाले गुलज़ार साहब की लिखी ‘गुड्डी’ फ़िल्म की रचना “हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करे...” आज भी जाने कितनी ही स्कूलों में बतौर प्रार्थना गाई जाती है। फिर भी कभी गुलज़ार जी को इस बात को याद दिलाते हुए भी किसी ने सुना? मीनाकुमारी जैसी शायर मिजाज़ अभिनेत्री ने अपनी डायरी का वारिस उन्हें बनाया था ऐसी किसी बात का अनुचित उल्लेख तक नहीं सुनने में आया। उनकी बातों में ‘आई प्रोब्लेम’ नहीं होता है। इस लिए गुलज़ार के जीवन और गीतों को जोड़ती एक लेखमाला करने का इरादा है.... क्या पता? शायद इसी बहाने हो जाये! फिर ऐसा भी नहीं है कि उनके सिर्फ़ पुराने गानों में ही  ‘ऑफबीट’ नज़रिया छलकता था। नये गीतों में भी वही अंदाज़ बरकरार है। मगर कहानी के पात्रों के अनुरूप गाने लिखते है और शायद यही उनकी सफलता का रहस्य है।

जैसे कि ‘सत्या’ में टपोरी माहौल के पात्रों के लिए वे “गोली मार भेजे में....” लिखते हैं। तो “सपने में मिलती है...” में ऐसी पंक्ति भी देते हैं, “सारा दिन सडकों पे खाली रिक्षे सा पीछे पीछे चलता है....”! जब कि ‘बंटी और बबली’ में ‘कजरारे...” आइटम सोंग में “पर्सनल से सवाल करती है...” जैसा इंग्लिश शब्द प्रयोग भी करते हैं। मगर उसी फ़िल्म ‘बंटी और बबली’ के प्रणय गीत में अपनी ऑफबीट कल्पना का जबरदस्त सबूत गुलज़ार साहब की कलम से टपकता है। याद है ना फ़िल्म का शिर्षक गीत “बन्टी की बबली और बबली का बन्टी...”? उस गीत “छुप छुप के छुप छुप के चोरी से चोरी...” के ये शब्द कितने अफ़लातून हैं.... “देखना मेरे सर से, आसमां उड़ गया है....”! कोई चीज़ अगर उड़ जाय तो आकाश में जाती है; मगर खुद आसमान ही उड़ जाय ये कैसी कल्पना? उसका खुलासा दुसरी पंक्ति में वे करते हैं, “देखना... आसमां के सिरे खुल गये हैं ज़मीं से...”। गुलज़ार जी की कल्पना तो देखीए? वे आकाश को तंबू की तरह ज़मीन से बंधा देखते हैं और कहते हैं उस के सिरे खुल गये हैं! गुलज़ार साहब की अन्य कविताओं के बारे में विस्तार से फिर कभी बात करेंगे। आज तो अपनी कल्पना के आकाश के सिरे को खोल देने वाले हमारे इस प्रिय कवि को ‘दादा साहब फाळके पुरस्कार’ से सम्मानित करने की घोषणा पर ‘हिन्दी टाइम्स’ की तरफ से हार्दिक बधाई!



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