जया (भादुडी) बच्चन: "मैंने कहा फूलों से हंसो तो वो खिल खिलाकर हंस दिये…"
सलिल दलाल  | अपडेटेड: Thursday, Apr 17, 2014 at 02:47 pm EST

हिन्दी सिनेमा को जिन अभिनेत्रियों ने अपने तरीके से एक अलग मोड़ दिया है, उनमें जो नाम सब से उपर रखने योग्य है, उस महान कलाकार जया भड़ुड़ी (अब बच्चन) का जन्मदिन अभी ९ अप्रैल के दिन था। जया जी ने हृषिकेश मुखर्जी की 'गुड्डी' से जब हिन्दी फिल्मों में प्रवेश किया; तब से तालीम ली हुई अभिनेत्रियों का एक नया चलन प्रारंभ हुआ। वैसे जया जी की ही तरह पूना फिल्म इन्स्टीट्युट से तालीम लेकर उन दिनों काफी छात्र बम्बई आये थे मगर जो स्थापित स्टार सिस्टम था, उसके रखवाले ये मानने के लिये तैयार नहीं थे कि अभिनय भी कोइ स्कूल में सिखाई जा सकने वाली कला है। इस लिये बहुधा लोग मानते थे कि उन नये 'ट्रेन्ड एक्टर्स' को छोटे मोटे रोल शायद मिल सकते थे मगर मुख्य भूमिका? कभी नहीं!

ऐसे दिनों में इन्स्टीट्युट के दो गोल्ड मेडलीस्ट छात्रों ने अर्थात 'सावन भादों' से नविन निश्चल ने और 'गुड्डी' से जया भादुडी ने एन्ट्री की और दोनों फिल्में सफल होने की वजह से उस समय के पूरे स्टार सिस्टम को जैसे जड़ से हिला दिया। ७० के दशक के प्रारंभ के क्या दिन थे वे! जया भादुडी ने एक ऐसी शालीन अभिनेत्री के रूप में अपने आप को स्थापित किया जिनकी हर भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। हर फिल्म में उनका रोल दमदार ही हुआ करता था।  जया भादुडी की सफलता के चलते उन्ही की तरह शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, दीप्ति नवल, ज़रिना वहाब, रामेश्वरी इत्यादि कितनी ही अभिनेत्रीयों को लेते निर्माता नहीं हिचकिचाए। उनकी अभिनय यात्रा का पूरा ब्योरा लिखने के लिये कई हफ्तों की लेखमाला करनी पडे। आज तो इस महफिल में हम जया भादुडी की फिल्मों के गीतों की हलकी सी झलक ही देखेंगे।  
अपनी पहली फिल्म 'गुड्डी' में जया जी को दो गीत मिले थे, उनको देखते ही लगे कि होनहार बिरवान के होते चिकने पात! उस फिल्म की प्रार्थना "हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करे…" देखो या क्लासिकल रचना "बोले रे पपीहरा…" में उनका अभिनय देखें; तो किसी एक फ्रेम में भी जया भादुडी नई अभिनेत्री नहीं लगतीं थीं। जैसे बरसों से अभिनय करने वाली मंजी हुई कोई एक्ट्रेस वसंत देसाई की धुन पर गुलज़ार के शब्द गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में गा रही हो।

उन दिनों में एक तरफ मसाला फिल्मों की जैसे बाढ़ चलती थी और दुसरी और हृषिदा, गुलज़ार, बासु चटर्जी जैसे सृजक बड़े स्टार्स की उन महँगी फिल्मों से स्पर्धा करते हुए अपनी तरह से फिल्में बनाते थे। स्मरण रहे, तब आज के मल्टीप्लेक्स जैसे छोटे सिनेमागृह नहीं थे, जिसमें छोटे बजट की फिल्मों को भी अच्छी तरह से चलने का मौका मिलता। ऐसे सभी वास्तवदर्शी निर्माता-निर्देशकों के लिये जया भड़ुड़ी मरूथल में मीठे जल के समान थीं।

उस वक्त जया भड़ुड़ी की लोकप्रियता किसी सुपर स्टार से कम नहीं थी। सब से बडी बात यह थी कि अभिनय के मामले में अच्छे से अच्छे अभिनेता के साथ किसी भी तरह की भूमिका के लिये वे सुसज्ज होतीं थीं। उदाहरण के तौर पर संजीव कुमार को ही ले लीजिये। संजीव की गिनती हमारे सबसे प्रतिभाशाली एक्टर्स में आज भी होती है । इतने मजबूत कलाकार के साथ जया जी ने कितनी विभिन्न भूमिकाएं की थी? याद है ना? ‘अनामिका’ में प्रेमिका, ‘कोशीश’ में पत्नी, ‘शोले’ में पुत्रवधु तो ‘परिचय’ में बेटी बनते हुए भी कोई हिचकिचाहट नहीं!

‘परिचय’ के गीत “बिती ना बिताई रैना…” में अपने पिता बने संजीवकुमार को गाने में साथ देती संवेदनाओं तथा संगीत दोनों की बारिकीयां समझने वाली पुत्री को ही ‘अनामिका’ में पति को बेडरूम में ललचाने के लिये “बाहों में चले आओ, हम से सनम क्या पर्दा….” गाती पत्नी के रूप में वही संजीव कुमार के साथ देखो और दोनों ही में जया जी इतनी ही स्वाभाविक लगती हैं। इसी तरह से ‘कोरा कागज़’ में “रुठे रुठे पिया, मनाउं कैसे…” गाकर वे पति को मनातीं नजर आईं और ‘जवानी दीवानी’ में भी “नहीं नहीं अभी नहीं, अभी करो इन्तज़ार…” का उत्तेजक गाना भी वे ही गातीं है।
‘जवानी दीवानी’ के एक और गीत “जाने जां ढूंढता फिर रहा हूं तुम्हें रात दिन मैं यहां से वहां….” में छुपा छुपी खेलते हीरो के साथ गाया। उस में आशा भोंसले से आर.डी. बर्मन ने जो भी स्वर की करामात करवाई थी, वे सारी जया जी ने ऐसे निभाई जैसे खुद गाती हों। (खास कर मंद्र स्वर में “तुम कहां?” इन शब्दों को गाना) जब कि ‘नौकर’ में “पल्लो लटके रे म्हारो पल्लो लटके….” के दौरान (फिर एक बार संजीव कुमार के साथ) राजस्थानी नृत्य करते देख “खम्मा घणी!” कहने का मन हो जाता है। क्यूंकि यूं देखा जाय तो जया जी (और संजीव कुमार भी!) नृत्य में इतना कम्फर्टेबल महसूस नहीं लगते थे। डान्स तो वे सिर्फ काम चलाउ ही कर लेतीं थीं।
इसलिये जया जी से डान्स करवाने की शायद निर्देशकों की भी इच्छा कम ही रहती थी। यह बात ‘ज़ंजीर’ से पहले अमिताभ बच्चन के साथ आई फिल्म ‘एक नज़र’ की गज़ल “हमीं करे कोइ सुरत उन्हें मनाने की, सुना है उन को तो आदत है भूल जाने की….” के दौरान भी देखी जा सकती है। वह गाना कोठे पर नाचनेवाली का होने के बावजुद उस गीत में नाच नहीं के बराबर है। अमिताभ – जया की पहली सुपर हीट फिल्म ‘ज़ंजीर’ में भी जया जी के लिये दो गीत थे। अगर “चक्कू छुरियां तेज करा लो…” में वे मेहनत से अपनी रोज़ी कमाने वाली नाचती – कूदती अल्हड़ लड़की हैं; तो “बना के क्यूं बिगाडा रे….” में साड़ी पहने गृहिणी हैं और दोनों में वे इतनी ही जचतीं हैं।
अमिताभ और जया बच्चन की जोड़ी की जो फिल्म उन के निजी जीवन में भी निर्णायक बनी (उस के रिलीज़ के तुरन्त बाद दोनों ने शादी की थी), उस पिक्चर ‘अभिमान’ का तो हर गाना अविस्मरणीय है। संगीतकार सचिन देव बर्मन ने उस फिल्म के तीनों युगल गीतों में जया जी के लिये तो लता मंगेशकर का ही स्वर पसंद किया; मगर अमिताभ के लिये तीन अलग अलग पुरूष गायकों को लिया. अगर “तेरे मेरे मिलन की ये रैना….” में किशोर कुमार, तो “तेरी बिन्दीया रे…” में मोहम्मद रफी और  “लूटे कोइ मन का नगर बन के मेरा साथी…” में मनहर उधास ने लता जी का साथ दिया। इनके उपरांत “नदिया किनारे…” और “तेरे बिना तेरे बिना…” जैसे सोलो गीत भी जया भादुड़ी को मिले थे। 
‘अभिमान’ में शिव स्तुति का एक श्लोक भी जया जी गातीं हैं। उस के लिये सचिन दा ने स्वर अनुराधा पौडवाल का लिया था। वह अनुराधा जी का हिन्दी फिल्मों के लिये किया गया सर्व प्रथम गान था। जया बच्चन की अमिताभ के साथ की एक और कृति ‘चुपके चुपके’ का शिर्षक गीत “चुपके चुपके चल री पुरवैया…’’ और अन्य चित्रपट ‘मिली’ का “मैंने कहा फूलों से हंसो तो वो खिल खिलाकर हंस दिये…” उसी ‘जया शृंखला’ के गाने हैं। जया भादुडी फिल्म ‘शोर’ के गीत “पानी रे पानी तेरा रंग कैसा….” का भी हिस्सा थीं। उस गीत में राजकवि इन्द्रजीत सिंह तुलसी ने एक अंतरे में ‘पानी’ शब्द का अर्थपूर्ण इस्तेमाल इस तरह किया था, “वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग दिखाये, जब तूँ फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ न आये..”   
मगर उम्मीद से भरे शब्द, गायकी, अदाकारी और सब से ज्यादा तो सलिल चौधरी की बंदीश के कारण ‘अन्नदाता’ फिल्म का लता जी का गीत “रातों के साये घने, जब बोझ दिल पर बने…” हमारा सब से प्रिय है। उस रचना में कवि योगेश के आशावाद से भरे शब्दों (“ना तो जले बाती, ना हो कोई साथी, फिर भी न डर, सहर तो है तेरे लिये…”) को सलिल दा ने कितने सुरीले अंदाज में लता जी से गवाये हैं! जया जी ‘बच्चन’ बनने के बाद भी जब भी पर्दे पर आईं दमदार भूमिका में ही आईं हैं। उन फिल्मों और उन के गीतों के बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे। फिलहाल तो अपने अभिनय से हमारा स्वस्थ मनोरंजन करनेवाली इस महान अभिनेत्री को उन के जन्मदिन पर हम सब स्वस्थ जीवन और दीर्घायु की शुभकामना करते हैं…. ‘हिन्दी टाइम्स’ की ओर से ‘हैप्पी बर्थ डे, जया बच्चन जी!!’



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