क्या फ़िल्म स्टार्स की सादगी और शालिनता का कोई मोल है?
सलिल दलाल  | अपडेटेड: Thursday, Apr 3, 2014 at 06:00 am EST

अभिनेत्री नंदा के बारे में पिछले हफ्ते आलेख लिखने के बाद उनकी अंतिम क्रिया में उपस्थित लोगों की संख्या के बारे में जानकर फिर एक बार आंखें नम हुईं। फ़िल्म उद्योग में चढ़ते सूरज को पूजने की जो परंपरा है उस हिसाब से भी उस अभिनेत्री के ज़नाज़े को कंधा देने गिने चुने ही लोग आये थे। आज के कोई 'खान' या 'कुमार' तो नहीं थे, मगर नंदा के दौर के कलाकार भी कहां थे? उनके साथ ८ फ़िल्में करने वाले शशि कपूर तो स्ट्रोक की वजह से कुछ सालों से चलने फिरने योग्य नहीं हैं। मगर जो आज भी एक या दुसरे रूप में कार्यरत हैं ऐसे ’६० और ’७० के धर्मेन्द्र, जीतेन्द्र, मनोज कुमार, रीशी कपूर, संजय खान या अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार?
इन में से कुछ ने ट्वीटर पर छोटा सा १४० केरेक्टर्स का संदेश देकर और अन्य कुछ ने किसी पत्रकार को दो मिनट का बाईट देकर संतोष लिया होगा। मगर क्या उन्हीं दिनों में होने वाले समारोह इन्डस्ट्री में यथावत नहीं हुए थे? जिस अभिनेत्री ने अपनी बचपन से लेकर अपनी ज़िंदगी के सबसे बेहतर साल फ़िल्मों को दिए और जिसका नाम कभी किसी विवाद से नहीं जुडा था, उसकी अचानक मौत पर जैसे किसी को कोई सरोकार ही नहीं था! क्या किसी ने वहीदा रेहमान जैसी संवेदनशीलता दिखाई? वहीदा जी की जीवनकथा २६ मार्च के दिन रिलीज़ होने वाले थी। यह पहली बार था कि वहीदा रेहमान ने किसी पत्रकार-लेखक से अपने जीवन के बारे में इतना खुलकर कुछ कहा है। लंदन की लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर को करीब ४० घंटे देकर कही उनकी अधिकृत जीवनी को पेंग्विन जैसे बड़े प्रकाशक प्रसिद्ध कर रहे थे। सारी तैयारीयां हो चूकी थी। लेखिका नसरीन भी लंदन से मुंबई आ चूकी थी और एन एक दिन पहले नंदा का देहांत हो गया!
वहीदा जी ने अपना वह कार्यक्रम तत्काल रद्द करवा दिया। इतना ही नहीं, अगले कुछ महीनों तक उस समारोह को स्थगित करवा दिया। लेखिका को वापिस लंदन भेज दिया। धर्मेन्द्र ने बाद में बताया कि जब वे नये थे, तब नंदा ने उनके साथ ‘आकाशदीप’ और ‘मेरा कसूर क्या है’ में काम कर के उनके जैसे ‘नये कलाकार’ का हौसला बढाया था। जीतेन्द्र की ‘परवरिश’ और ‘धरती कहे पुकार के’ साइन की तब नंदा जी ही सिनीयर और अधिक लोकप्रिय कलाकार थी। यही हाल ‘अभिलाषा’ के हीरो संजय खान का था। हालांकि अमिताभ बच्चन ने नंदा के साथ कोई फ़िल्म नहीं की थी; परंतु मनमोहन देसाई के साथ कितनी सुपर हीट फ़िल्में दी थीं? उन्हीं ‘मनजी’ की ज़िंदगी के अंतिम वर्षों का हिस्सा रहीं इस महिला की अंतिम यात्रा में वे भी नहीं थे।
स्मरण रहे, इन कलाकारों के नाम सिर्फ़ सिनेमा जगत के बदलते समय को दर्शाने और उस स्थिति पर व्यथा व्यक्त करने के वास्ते ही यहाँ लिये हैं। हर एक की अपनी व्यस्तता हो सकती है। मगर वो दिन कहाँ चले गये जब किसी कलाकार की मौत पर स्टुडियो में एक दिन काम बंद रखा जाता था और रंगारंग कार्यक्रम या तो रद्द किये जाते थे या सादगी से निपटाये जाते थे? मगर स्मशान यात्रा में शामिल होने में कितना वक्त जाता? ये स्वाभाविक है कि सभी वहीदा जी जैसा तो नहीं कर सकते। क्योंकि, वहीदा-नंदा की दोस्ती की मिसाल, हीरोइनों में भी मैत्री हो सकती है इस बात के लिए, फ़िल्मी दुनिया में दी जाती है। सिनेमा के व्यावसायिक जगत में स्पर्धा के चलते किसी दो हीरोइनों में कभी बनती नहीं थी। 
मगर नंदा और वहीदा जी की दोस्ती उस माहौल में जबरदस्त बदलाव लाई । दोनों ने एक साथ देव आनंद की ‘काला बाज़ार’ में काम किया तब से, यानि १९६० से, शुरु हुई दोस्ती २०१४ तक बरकरार रही। ये भी नहीं था कि बतौर हीरोइन करियर समाप्त हो जाने के बाद ही वे दोनों अधिक निकट आये थे। बल्कि जब उन दोनों का सूरज अपने मध्यान्ह पर था, तब वे दोनों ज़्यादा नज़दीक थीं। उन दोनों की पिकनिक पर मज़े करतीं या कोई खेल खेलती तस्वीरें फ़िल्मी सामयिकों में देखना उन दिनों सामान्य था। वहीदा जी ने अपनी जीवन कथा में उन दिनों के बारे में भी कहा होगा। लेकिन एक बात तो ज़ाहिर है कि नंदा को मनमोहन देसाई के साथ सगाई के लिए मनाने वालीं वहीदा जी ही थीं।
मनमोहन देसाई की अचानक और कुछ हद तक रहस्यमय मौत ने नंदा के जीवन को फिर उसी जगह पर लाकर खडा कर दिया था। मगर अपने लिए सहानुभूति बटोरने के लिए उन्होंने उस संबंध का ज़िक्र तक कभी नहीं किया था! ऐसी सादगी और शालिनता भी लगता है बीते दिनों के कलाकारों में अधिक थी। नंदा जी की मित्रता उनके साथ बोक्स ओफिस पर बराबर की टक्कर देने वाली एक और स्पर्धक और अपने ज़माने की सब से ग्लेमरस अभिनेत्री आशा पारेख से भी पिछले बरसों में कितनी अधिक थी? वैसे तो नंदा, आशा पारेख, साधना, वहीदा रेहमान, हेलन वगैरह का एक गृप था, जो अक्सर मिलता रहता था। आखिरी बार वे सभी तीन दिन पहले २२ मार्च को लंच पर मिले थे। आशा जी ने तो नंदा जी की मृत्यु की अगली रात भी उनसे बात की थी।
आशा पारेख ने २४ मार्च की रात टेलिफोन पर नंदा से करीब एक घंटा बात की थी। उस वक्त नंदा का स्वास्थ्य बिलकुल सामान्य था। कहीं कोई गंभीर शिकायत या बीमार होने की कोई बात नहीं थी। दुसरी सुबह आशा जी को खबर मिली कि नंदा का देहांत हो गया, तो वो सदमा कैसा होगा! इतनी अचानक मौत पर उनके ज़माने की एक और बड़ी अभिनेत्री साइरा बानु ने कहा कि नंदा उनसे और दिलीप कुमार से मिलने आती थी, तब कहतीं थीं कि वे होस्पिटल में रहकर पल पल मरने के बदले बिना किसी लंबी बीमारी के और अन्यों को तकलीफ दिए बिना एक दिन चली जाना चाहती हैं। और आखिर वही हुआ। नंदा इन्डस्ट्री के किसी पोलीटिक्स का हिस्सा नहीं थीं और ७५ साल की आयु में किसी विवाद से नहीं जुडी थी। किसी ने याद कर के कभी ‘लाइफ़ टाइम अचीवमेंट एवार्ड’ भी नहीं दिया! उनकी अंतिम यात्रा से एक आशंका फिर हुई कि चमक-दमक के पीछे भागने वाली इन्डस्ट्री में सादगी और शालिनता के लिए शायद अब कोई जगह नहीं है। आप को क्या लगता है?



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