नंदा: “दो पल के जीवन से, इक उम्र चुरानी है....!”
सलिल दलाल  | अपडेटेड: Thursday, Apr 3, 2014 at 05:52 am EST

सिनेमा प्रेमीओं के लिए २५ मार्च का दिन एक ऐसी खबर लेके आया जिस का जरा सा भी अंदेशा नहीं था। उस दिन १९५५ से ’७५ तक के बीस बरस दर्शकों के दिल में अपनी शालिन छवी प्रस्थापित करने वाली अभिनेत्री नंदा का निधन हो गया। इस वर्ष ८ जनवरी को अपनी ७५ वीं सालगिरह मनाने के बावजुद नंदा जी के स्वास्थ्य के बारे में कभी कोई चिंता वाली खबर नहीं आई थी। हां, उनके २००६ के ‘मिड डे’ से हुए साक्षात्कार में उन्हों ने जोड़ों के दर्द की शिकायत का ज़िक्र जरूर किया था। मगर ऐसी शिकायत तो किस सिनियर को नहीं होती है?
नंदा और सिनियर! सुनने में कैसा अजीब लगता है? क्योंकि नंदा को हिन्दी सिनेमा के दर्शकों ने ‘बेबी नंदा’ के नाम से बाल कलाकार के रूप में अपनी अभिनय यात्रा का आरंभ करते देखा था। एक फ़िल्म में तो स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के छोटे भाई की भूमिका में भी थी। लता जी भी उन दिनों बाल कलाकार के रूप में अभिनय ही करती थीं। असल में वे दोनों को अपने अपने परिवार के लिए उतनी छोटी उम्र से कमाना शुरू कर देना पड़ा था। नंदा के पिताजी मास्टर विनायक अपने समय के जाने-माने अभिनेता-निर्माता-निर्देशक थे।
एक दिन पिताजीने कहा कि उनकी फ़िल्म में एक छोटे लड़के का रोल है और उसके लिए उन्होंने नंदा का चुनाव किया था। मगर नंदा ने कहा उन्हें तो सुभाषचंद्र बोस की सहयोगी कैप्टन लक्ष्मी जैसा बनना है। इस भूमिका के लिए भाई को स्टुडियो ले जाओ! परंतु, पिताजी नहीं माने और मां ने नंदा के बाल लड़कों जैसे कटवा कर एक्टिंग के लिए बेटी को बेटा बनाया। कुदरत का खेल देखिए कि उसी चित्र के सृजन के दौरान मास्टर विनायक का देहांत हो गया और नंदा को अपने परिवार के लिए सचमुच ही ‘बेटा’ बनना पड़ा! घर की जिम्मेदारी ‘बेबी नंदा’ के नाजुक कंधों पर आई।
पिताजी की मौत के बाद स्थितियां बिलकुल बदल गई। लोग पलट गए। मास्ट्र विनायक का शिवाजी पार्क में बंगला था वो बेच देना पडा। गाडी भी नहीं रही। नंदा की बाल कलाकार के रूप में होती कमाई से घर चलता था। उस दौर में ‘बेबी’ स्टेज और रेडियो प्रोग्राम भी करती थी। उन्होंने एक फ़िल्म ‘अंगारे’ में नरगीस के बचपन की भूमिका की। नंदा के परिवार को बडा सहारा उनके अंकल व्ही. शांताराम का था। बाल कलाकार और युवा अभिनेत्री के बीच की उम्र में वे थीं; तब एक पारिवारिक समारोह में शान्ताराम जी ने नंदा को देखकर उनकी माता को कहा “इसे साडी पहनाकर कल स्टुडियो ले आईए।”
इस तरह मिली थी नंदा को अपनी प्रथम फ़िल्म ‘तुफ़ान और दीया’। तब से उनके नाम के पहले आता ‘बेबी’ शब्द निकल गया। मगर जैसे ही प्रसाद प्रोडक्शन की ‘छोटी बहन’ में बलराज साहनी की बहन के रूप में एक अंधी लड़की की भूमिका करने को मिली; नंदा ‘बेबी’ से ‘बहन’ बन गई। ‘छोटी बहन’ का यह शिर्षक गीत “भैया मेरे छोटी बहन को न भूलाना..” हर राखी पर रेडिओ और टीवी पर आज भी बजता है। मासुम बहन की उनकी छवी किस हद तक पहचान बन चूकी थी वो राजकपूर की प्रसिद्ध उक्ति से भी पता चलता है।
राज साहब ने जब नंदा जी को ‘प्रेमरोग’ के लिए साईन किया, तब कहा था कि “अब ‘छोटी बहन’ को मैं ‘छोटी मां’ बनाउंगा । ” राजकपूर के उस विश्वास का ही परिणाम था कि ‘प्रेमरोग’ के अपने अभिनय के लिए नंदा को ‘श्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री’ के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए मनोनीत किया गया था। ‘बेस्ट सपोर्टिंग ऐक्ट्रेस’ का एवार्ड उन्हें ‘आंचल’ के लिए मिला था। ( एक रोचक बात ये भी है कि उसी विभाग में उस फ़िल्म के लिए ललिता पवार का भी उस वर्ष नोमिनेशन था।) इस के अलावा ‘आहिस्ता आहिस्ता’ और ‘भाभी’ में भी नंदा उसी केटेगरी की उम्मीदवार थीं।
‘भाभी’ हो या ‘आंचल’ सामाजिक फ़िल्मों में नंदा होती जरूर थी; मगर हीरो के साथ प्रेम कोई और ही करता था। यहां तक कि सदा रोमेन्टिक देव आनंद के साथ भी ‘काला बाज़ार’ में बहन बनना पडा। मगर देव साहब ने नंदा की खुबसुरती और अभिनय प्रतिभा को पहचाम लिया था। उन्होंने अपनी फ़िल्म ‘हम दोनों’ की एक नायिका नंदा को लिया। ‘हम दोनों’ में “अल्ला तेरो नाम, इश्वर तेरो नाम..” प्रार्थना नंदा जी ने गाई। तो बतौर नायिका राज कपूर के साथ ‘आशिक’ में काम किया और ‘धूल का फूल’ में राजेन्द्र कुमार के साथ हीरोईन। इस तरह से उस दौर के चार टोप स्टार्स में से तीन हीरोइन बनकर ‘बहन’ न रही। (चौथे स्टार, जो वास्तव में उन दिनों ‘नम्बर वन’ थे, दिलीप कुमार के साथ बरसों बाद ‘मज़दुर’ में काम किया।) नंदा अब टोप ग्रेड में अवश्य थी; परंतु, ‘हीट हिरोईन’ बनीं ‘जब जब फूल खिले’ से।
‘जब जब फूल खिले’ का हर गाना लोकप्रिय हुआ। फिर चाहे वो “परदेसीयों से ना अखियां मिलाना...” हो या “ना ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे...”। मगर नंदा की ग्लेमरस छवी बनी इस गीत से, “ये समा, समा है ये प्यार का, किसी के इन्तजार का, दिल ना चुरा ले कहीं मेरा मौसम बहार का...” उस फ़िल्म के हीरो शशि कपूर अभी पैर जमा ही रहे थे, तब नंदा ने उनके साथ ‘चार दीवारी’ की थी। नंदा और शशि कपूर की जोडी के चलचित्रों की जैसे कतार लग गई... ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ,’ ‘जुआरी’, ‘नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे’, ‘रुठा न करो,’ ‘राजा साब,’ इत्यादि।
नंदा ने उस दौर के हर नये एक्टर के साथ अपनी वरीयता का दम भरे बिना काम किया। फिर वो ‘पति पत्नी’ से अपना करियर शुरु करते संजीव कुमार हो या ‘बेदाग’ से आगे बढ़ते मनोज कुमार। जीतेन्द्र के साथ ‘परिवार’ की जिसका गाना “हमने जो देखे सपने, सच हो गए वो अपने...” काफी लोकप्रिय हुआ था। तो जीतेन्द्र के साथ की अन्य एक फ़िल्म ‘धरती कहे पुकार के’ का ये युगल गान “जे हम तुम चोरी से, बंधे इक डोरी से...” कौन भूल सकता है? उन दिनों नये आये संजयखान के साथ ‘अभिलाषा’ की जिसका हमारा प्रिय ये गाना, “वादीयां मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें...”। उनकी फ़िल्म ‘दी ट्रेन’ के हीरो राजेश खन्ना की सिफ़ारिश नंदा ने की थी। खन्ना साहब ने नंदा के लिए “गुलाबी आंखें जो तेरी देखी...” गाया।
मगर एक इन्टर्व्यु में नंदा ने कहा था कि संघर्ष करने वाले एक्टर जब स्टार बन जाते हैं तब बदल जाते हैं। वैसे ‘गुमनाम’ फ़िल्म के उनके हीरो मनोज कुमार नंदा को नहीं भूले थे। उन्हों ने ‘शोर’ में छोटी भूमिका और “इक प्यार का नग्मा है...” जैसा बेहतरीन गाना भी दिया। उस गीत की यह पंक्ति कई लोगों के जीवन का प्रतिबिंब हो सकती है, “दो पल के जीवन से, इक उम्र चुरानी है....!” जिनके खुबसुरत अंदाज़ के लिए ‘तीन देवियां’ में देव आनंद ने गाया था “ऐसे तो न देखो कि हम को नशा हो जाए...”, उन्हें अपनी पसंद का जीवन-साथी न मिला! पिछली उम्र में मनमोहन देसाई से सगाई तो हुई, मगर शादी से पहले ही उनकी मृत्यु हो जाने से नंदा जी को दांपत्य जीवन का सुख नहीं मिल पाया था।
नंदा भी, अपने परिवार का ‘बेटा’ बनते बनते निजी सुखों का बलिदान देनेवाली अनगिनत बेटियों में शामिल थी। उनकी फ़िल्म ‘बडी दीदी’ का ओमप्रकाश के साथ का सीन याद करें, जिस में वे अपने निजी आंसु पोंछकर, परिवार के लिए दुनिया के सामने हंसते हुए पेश होती हैं। उस द्दश्य के शूटिंग के दिन सीन के अंत में रोते रोते उन्होंने जिस अंदाज़ से ओम जी से पूछा, “मैने अच्छा नाटक किया ना, चाचा? मैं रोई थी क्या? मैं नहीं रोई, मैं नहीं रोई...” ओम प्रकाश और सेट पर उपस्थित सभी लोगों की आंखों से उस दिन बिना ग्लिसरीन के आंसु नीकल पडे थे। स्वाभाविक है कि उस द्दश्य में पूरे सिनेमा हॉल की आंखें छलक जाती थी। इतनी भावप्रवण अभिनेत्री के इस छोटे से श्रध्धांजलि आलेख को लिखते हुए “हम रोये हैं क्या? नहीं रोये... हम नहीं रोये!”



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