प्रतिज्ञा करें हम, दिखाते रहेंगे दम
आशा त्रिपाठी  | अपडेटेड: Friday, Mar 7, 2014 at 08:15 am EST

महिलाओं की बदहाली और मौजूदा हालात की चर्चा से पहले मैं यह आह्वान करती हूं कि दुनिया भर की महिलाएं एकजुट होकर यह प्रतिज्ञा करें कि हम किसी से कम नहीं रहेंगे और इसी तरह आगे बढ़ते रहने के लिए दमदार भूमिका निभाकर खुद को सामर्थ्यवान बनाते रहेंगे। महिलाएं अपने परिवार के लिए अथक परिश्रम करती हैं पर उनके श्रम को कोई सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं है। भारत में तो कर्तव्य और प्रेम की ओट में उनके श्रम की अनदेखी की जाती है। मगर दु:ख की बात यह है कि भारतीय महिलाओं की स्थिति सरकार के समस्त प्रयासों के बावजूद दयनीय है। आज सबसे बड़ी समस्या महिलाओं की स्वतंत्रता नहीं, सुरक्षा की है। संसद की महिलाओं के पोषण से सम्बन्धित कामकाज देखने वाली केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की लोकसभा प्राक्कलन समिति ने सरकार से इस बात की अपनी शिकायत भी दर्ज भी करा चुकी है। समिति ने कहा है कि देश में आज भी 70 प्रतिशत बच्चे और 60 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं। देश तमाम क्षेत्रों में विकास कर रहा है, संचार और तकनीकी युग में इतना कुपोषण ठीक नहीं है। देश में हर बार बजट बढ़ता है और हर बार कुपोषण भी सामने आता है। हर बार कुपोषण, रक्त अल्पता, निरक्षरता की शिकार महिलाओं की संख्या करोड़ों में हो जाती है। आज देश में करीब 40 प्रतिशत लड़कियों का बाल विवाह भी खेदजनक है। दुर्भाग्य की बात है जिस समय संयुक्त राष्ट्र बाल विवाह रोकने की बात कर रहा था ठीक उसी समय हरियाणा में एक नेता ने 15 वर्ष में लड़कियों के विवाह की सलाह दे डाली। भारतीय समाज, यहां का शासक वर्ग अपने हितों को बनाये रखने व राजनैतिक पार्टियां अपने चुनावी गणित की दृष्टि से सामंती मूल्यों को बनाये रखे हुए हैं। यही कारण है कि भ्रूण हत्या, बाल विवाह, दहेज प्रथा जैसी स्त्री विरोधी प्रथाएं और परम्पराएं आज भी बदस्तूर जारी हैं।
बीते वर्ष जून माह में 'थॉम्सन रॉयटर्स फ़ाउंडेशन' द्वारा दुनिया की महिलाओं की दशा के बारे में एक सर्वेक्षण कराया गया था। इस संबंध में 19 देशों (भारत, मेक्सिको, इंडोनेशिया, ब्राज़ील सउदी अरब जैसे देश) के 370 विशेषज्ञों से महिलाओं की स्थिति के बारे में राय ली गई। इसमें भारत आख़िरी नंबर पर था। भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश सर्वेक्षण में शामिल नहीं किए गए। इस सर्वेक्षण में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और हिंसा जैसे कई विषयों पर महिलाओं की स्थिति की तुलना ली गई थी। सर्वेक्षण में कैनेडा को महिलाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ देश बताया गया। कैनेडा की महिलाओं को समानता हासिल है। उन्हें हिंसा और शोषण से बचाने के प्रबंध हैं और उनके स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल होती है। पहले पांच देशों में जर्मनी, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देश रहे। अमेरिका छठे नंबर पर रहा। सर्वेक्षण में भारत की स्थिति को सउदी अरब जैसे देश से भी खराब बताया गया है, जहां कई क्षेत्रों में तो अब भी महिलाओं को गाड़ी चलाने और मत डालने जैसे बुनियादी अधिकार हासिल नहीं हैं। सर्वेक्षण कहता है कि भारत में महिलाओं का दर्जा दौलत और उनकी सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है। भारत के 19 देशों की सूची में सबसे अंतिम पायदान पर रहने के लिए कम उम्र में विवाह, दहेज, घरेलू हिंसा और कन्या भ्रूण हत्या जैसे कारणों को गिनाया गया है। भारत में सात वर्ष पहले बना घरेलू हिंसा क़ानून एक प्रगतिशील कदम है मगर लिंग के आधार पर भारत में हिंसा अभी भी हो रही है । भारत में दिल्ली और इसके आस-पास आए दिन महिलाओं के राह चलते उठा लेने और चलती गाड़ी में सामूहिक दुष्कर्म जैसी खबरें आती रहती हैं। देह व्यापार के लिए महिलाओं की तस्करी और शोषण की खबरें भी आम हैं।
हालांकि भारत में महिलाओं का इतिहास काफी गतिशील रहा है, फिर भी महिलाओं के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, जो नहीं हो रहा है। आधुनिक भारत में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, प्रतिपक्ष की नेता आदि जैसे शीर्ष पदों पर रही हैं, फिर भी महिलाओं को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिला है। यह अलग बात है कि भारत में महिला साक्षरता दर धीरे-धीरे बढ़ रही है लेकिन यह पुरुष साक्षरता दर से कम है। लड़कों की तुलना में बहुत ही कम लड़कियाँ स्कूलों में दाखिला लेती हैं और उनमें से कई बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देती हैं। नेशनल सैम्पल सर्वे डेटा के मुताबिक केवल केरल और मिजोरम राज्यों ने सार्वभौमिक महिला साक्षरता दर को हासिल किया है। ज्यादातर विद्वानों ने केरल में महिलाओं की बेहतर सामाजिक और आर्थिक स्थिति के पीछे प्रमुख कारक साक्षरता को माना है परंतु महिला साक्षरता के आधार पर हम अन्य देशों से आज भी पिछड़े हुये हैं। महिलाओं की इस दशा के लिए अगर देखा जाए तो पूरा देश जिम्मेदार है क्योंकि हम आज हर क्षेत्र में अंग्रेजों की नकल करने में लगे हुये हैं। यूरोपीय सभ्यता के जनक माने जाने वाले प्लेटो ने अपनी किताब में लिखा है की ‘स्त्री एक उपभोग की वस्तु है’  जिसे हर तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। यूरोप के देशों में तो स्त्रियां दशा देखने योग्य तक नहीं है। अब धीरे-धीरे वो यहां भी होने लगा है। इससे बड़ी बिडम्बना हम लोगों के लिए कुछ नहीं हो सकती है। आख़िर वजह क्या है जो औरतों को कमतर आंका जाता है, जबकि स्त्री के बिना दुनिया ख़त्म हो जाएगी। 
प्रकृति ने स्त्री की शारीरिक संरचना ऐसी बनाई है जिससे संतति का काम सिर्फ स्त्री ही कर सकती है। शायद यही सबसे अहम् कारण है जिससे स्त्रियां प्रताड़ित होती हैं। चाहे वो शारीरिक उत्पीड़न हो या मानसिक या सामजिक। किसी भी क्षेत्र में कमतर न होते हुए भी स्त्री कमजोर हो जाती है। जन्मजात कन्या हो या 100 साल की वृद्ध महिला, आज कहीं भी अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करती है। न अपने घर में न समाज में। न अपनों के बीच न परायों के बीच। कहीं नहीं। दरअसल, निम्न मानसिकता वाले पुरुष न उम्र देखते हैं न रिश्ता, उनके लिए स्त्री  मात्र एक देह वस्तु बन जाती है। कोई स्त्री एक बार दुराचार की शिकार हो गई हो तो न सिर्फ घर-समाज और धर्माधिकारियों  की नफ़रत झेलती है बल्कि उसे ख़ुद से भी नफ़रत हो जाती है। जब किसी को ख़ुद से नफ़रत हो जाए तो जीवन की सभी संभावनाएं ख़त्म हो जाती है उनके लिए तो जीवन एक अभिशाप बनके रह जाता है जिसे आए दिन न जाने कितनी महिलाएं झेलती है। उनमें से कुछ ही ऐसी होती हैं जो अपने सम्मान के लिए लड़ती हैं कुछ तो आत्महत्या तक कर लेती हैं और न जाने कितनी महिलाएं अपने साथ हुये दुर्व्यवहार को उजागर ही नहीं होने देती है और फिर बार बार वो ही प्रताड़नाएं झेलने के लिए विवश हो जाती हैं बलात्कारियों को चाहे कितनी भी कड़ी सजा मिल जाए किन्तु जो स्त्री इस दंश को झेलती हैं उनकी मानसिक दशा परिवर्तन एवं आत्म सम्मान के लिए कोई कानून नहीं बन सकता है और न ही उस पीड़ा से उनको आजीवन निजात मिलती है।
पेरू के प्रख्यात लेखक और वर्ष 2010 के साहित्यो श्रेणी के नोबेल पुरस्कांर विजेता मारिओ वर्गास लोसा ने कहा था-"ऐसा मालूम होता है कि साहित्य अधिक से अधिक औरतों के क्रिया-कलाप की चीज हो गयी है। पुस्तक की दुकानों में, किसी सम्मेलन में या लेखकों के सार्वजनिक पठन में और मानविकी के लिए समर्पित विश्वविद्यालय के विभागों में भी स्त्रियां स्पष्ट रूप से पुरुषों से आगे निकल जाती हैं।" हो सकता है कि लेखक का यह कथन कुछ लोगों को अतिरंजित अथवा हकीकत से परे लग रहा हो। इसका कारण यह है कि भारतीय समाज की बुनावट पेरू से सर्वथा भिन्न है। शैक्षिक ही नहीं अगर हम आर्थिक दृष्टिकोण से भी देखें, तो दोनों समाजों के बीच काफी अंतर देखा जा सकता है। लेकिन जब हम मुद्रित साहित्य की दुनिया से निकलकर ऑनलाइन दुनिया में आते हैं, तो मारिओ के इस कथन का मतलब साफ-साफ समझ में आता है। वैसे तो इंटरनेट के रथ पर सवार ‘ऑनलाइन डायरी’ के रूप में विकसित हुए ब्लॉग जगत में दूर से देखने पर आज भी पुरूषों का वर्चस्व दिखाई पड़ता है, लेकिन यदि गहराई से देखा जाए, तो बिना शोर-शराबा किए पूरी गम्भीरता के साथ लगातार काम करने वाले ब्लॉरगर्स में महिलाओं का प्रतिशत अच्छा खासा है। दिलचस्पी  की बात यह है कि यह प्रतिशत प्रिंट मीडिया के मुकाबले कहीं ज्यादा है। भले ही प्रिंट जगत के धुरंधर ऑनलाइन साहित्य  को ‘कचरा साहित्यर’ घोषित करके अपनी अज्ञानता और बहुत हद तक दम्भीपन का प्रदर्शन कर रहे हों, पर महिला लेखिकाएँ उन सबकी परवाह किए बिना लगातार अपना काम कर रही हैं और बेहतर ढंग से कर रही हैं।
Contact : Asha Tripathi, P-2, Flat No. 145, Deepganga Apartment, SIDCUL, Roshnabad, Haridwar (Uttarakhand) 



आपकी राय


Name Email
Please enter verification code